
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव लड़ने की कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की कोशिशों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दाखिल याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक दखल को संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत सीमित रखा गया है और यदि इस स्तर पर सुनवाई की जाती है तो यह एक नई परंपरा की शुरुआत होगी, जिसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।
मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र को रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका नामांकन इस आधार पर रद्द किया गया कि उन्होंने तेलंगाना की एक अदालत में लंबित एक आपराधिक मामले की जानकारी नामांकन पत्र में नहीं दी थी। नटराजन का तर्क था कि चुनावी नियमों के तहत केवल उन मामलों की जानकारी देना आवश्यक है, जिनमें अदालत आरोप तय कर चुकी हो। उनके मामले में केवल नोटिस जारी हुआ था और आरोप तय नहीं हुए थे, इसलिए जानकारी छिपाने का सवाल ही नहीं उठता।
सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला पूरी तरह अन्यायपूर्ण है और कानून की गलत व्याख्या पर आधारित है। सिंघवी ने बीएनएसएस की धारा 223 का हवाला देते हुए कहा कि नए कानून के अनुसार किसी व्यक्ति के खिलाफ संज्ञान लेने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।
हालांकि, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या कोई ऐसा उदाहरण मौजूद है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने नामांकन रद्द होने के मामले में चुनाव प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329 स्पष्ट रूप से चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करता है और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही संबंधित उम्मीदवार चुनाव याचिका के माध्यम से राहत मांग सकता है।
कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की उस मांग को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। इस फैसले के साथ फिलहाल नटराजन को तत्काल राहत नहीं मिली है, जबकि चुनावी प्रक्रिया अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ेगी।







