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विकास या विनाश की मंज़ूरी?

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Written by
Rishabh Rai

तरक्की और विकास के नाम पर हम वर्षों से प्रकृति के साथ एकतरफ़ा समझौता करते आ रहे हैं—ऐसा समझौता जिसमें फायदा केवल वर्तमान का है और कीमत भविष्य चुका रहा है। अब इसी कड़ी में अरावली पर्वतमाला को 100 मीटर के दायरे में बाँधकर पहाड़ों को मिटाने की स्वीकृति दी जा रही है। यह फैसला सिर्फ़ एक पर्यावरणीय अनुमति नहीं, बल्कि हमारी सोच और प्राथमिकताओं पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है।

अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है। यह देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो दिल्ली-एनसीआर से लेकर राजस्थान तक पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ रही है। अरावली ने दशकों तक मरुस्थलीकरण को रोका, भूजल को संरक्षित किया, प्रदूषण को थामा और लाखों लोगों को स्वच्छ हवा दी। आज उसी अरावली को “विकास” की परिभाषा में बाधा बताकर काटा जा रहा है।

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हम जिस विकास की बात कर रहे हैं, वह किसके लिए है? ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और खनन परियोजनाओं के लिए? अगर यही विकास है, तो इसके परिणाम भी उतने ही स्पष्ट हैं—हवा ज़हरीली होगी, पानी ज़मीन के नीचे और नीचे जाएगा, और गर्मी असहनीय होती चली जाएगी। जब हम प्राकृतिक पहाड़ नहीं बचा पाएँगे, तो भविष्य में पेड़ों के नहीं, बल्कि कचरे और कंक्रीट के पहाड़ ज़रूर दिखेंगे।

आज हालात यह हैं कि हम प्रदूषण से लड़ नहीं पा रहे। शहरों में सांस लेना चुनौती बन चुका है। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक बीमारियाँ बढ़ रही हैं—अस्थमा, एलर्जी, हृदय रोग। इसके बावजूद हम वही नीतियाँ अपना रहे हैं, जो इस संकट को और गहरा करें। सवाल यह नहीं है कि विकास चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि कैसा विकास?

विकास अगर प्रकृति को कुचलकर होगा, तो वह टिकाऊ नहीं हो सकता। यह आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है। हम उन्हें न साफ़ हवा दे पाएँगे, न पानी, न सुरक्षित जीवन। प्राकृतिक आपदाएँ—बाढ़, सूखा, हीटवेव—और अधिक भयावह होंगी, और तब हम फिर प्रकृति को दोष देंगे, जबकि गलती हमारी होगी।

ज़रूरत इस बात की है कि सरकारें, नीतिनिर्माता और समाज मिलकर विकास की दिशा पर पुनर्विचार करें। पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ केवल काग़ज़ी औपचारिकता न बनें। अरावली जैसे प्राकृतिक रक्षकों को संरक्षित करना विकास-विरोध नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास की शर्त है।

इसे विकास मत कहिए। यह भविष्य की कीमत पर किया गया एक खतरनाक समझौता है—जिसका खामियाज़ा हमारी आने वाली पीढ़ियाँ चुकाएँगी। अब भी वक्त है कि हम चुनें: कंक्रीट का वर्तमान या सुरक्षित भविष्य।

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