
पिछले चार दिनों में देशभर में हजारों फ्लाइट्स के रद्द होने की खबर ने यात्रियों को भारी परेशानी में डाल दिया है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत के कई एयरपोर्ट्स पर यात्रियों की भीड़ और तनावपूर्ण हालात देखे गए। इंडिगो एयरलाइंस सबसे अधिक प्रभावित रही, और सवाल उठता है- क्या यह केवल नियमों की वजह से हुआ या एयरलाइन की तैयारी में गंभीर चूक है।
इस पूरे संकट की जड़ DGCA द्वारा लागू किए गए पायलट वीकली रेस्ट नियम में हैं। नियम के अनुसार पायलटों को सप्ताह में कम से कम एक दिन अवकाश देना अनिवार्य है, ताकि उड़ानों में सुरक्षा खतरे न बढ़ें। यह एक सराहनीय कदम है और सुरक्षा के लिहाज से आवश्यक भी है। लेकिन समस्या तब पैदा हुई, जब एयरलाइंस ने इस नियम के क्रियान्वयन के लिए समय पर पर्याप्त व्यवस्था नहीं की। परिणामस्वरूप 586 से अधिक फ्लाइट्स अचानक रद्द हो गईं।
यात्रियों की असुविधा गंभीर है। कई लोग एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं, कुछ को यात्रा टालनी पड़ी, तो कुछ को दो-दोगुने किराए चुकाने पड़े। एयरपोर्ट्स पर तनाव और मारपीट जैसी घटनाएँ भी सामने आई हैं। इसका सीधा असर सामान्य जनता पर पड़ रहा है, जबकि एयरलाइंस और सरकारी अधिकारी इसे केवल “व्यवस्था सुधार” का मामला मान रहे हैं।
यह संकट एयरलाइन और नियामक दोनों की तैयारी की कमजोरी को उजागर करता है। DGCA ने नियम का पालन सुनिश्चित करने के लिए छूट दी थी, लेकिन एयरलाइंस ने इसके प्रबंधन के लिए पूर्व योजना नहीं बनाई। यह बताता है कि नियम केवल कागज पर लागू होने से काम नहीं चलता; प्रभावी क्रियान्वयन और यात्रियों के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सुरक्षा नियमों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए, लेकिन यात्रियों की सुविधा और आपातकालीन उपाय भी प्राथमिकता में होने चाहिए। इंडिगो जैसी बड़ी एयरलाइन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके सिस्टम में ऐसी स्थिति का निपटारा पहले से तैयार हो। सरकार और नियामक संस्थाओं को भी एयरलाइंस के साथ मिलकर यात्रियों के लिए वैकल्पिक प्रबंधों की गारंटी देनी होगी। यह स्थिति दर्शाती है कि नियम और सुरक्षा तो आवश्यक हैं, लेकिन उनका असंतुलित क्रियान्वयन आम नागरिक की असुविधा और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। फ्लाइट रद्दी की यह घटना हमें याद दिलाती है कि सुरक्षा नियमों और यात्री सुविधा में संतुलन बनाना ही जिम्मेदार शासन और उद्योग की पहचान है।




