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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : संगठन, सेवा और राष्ट्र निर्माण की यात्रा

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Written by
सुयश शुक्ला

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) आज भारत का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है। इसकी स्थापना 27 सितम्बर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उस समय देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और समाज कई तरह की कुरीतियों व बंटवारे की मानसिकता से ग्रस्त था। ऐसे समय में डॉ. हेडगेवार ने एक ऐसे संगठन की नींव रखी जो अनुशासन, देशभक्ति और संगठन के माध्यम से भारत को मजबूत बनाने के लक्ष्य पर काम करे।

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संघ की सबसे खास पहचान उसकी शाखाएँ हैं। सुबह या शाम को मैदान में लगने वाली शाखाओं में स्वयंसेवक एकत्र होकर शारीरिक व्यायाम, खेल, योग, देशभक्ति गीत और बौद्धिक चर्चा करते हैं। यह केवल शारीरिक प्रशिक्षण का मंच नहीं है, बल्कि यहाँ चरित्र निर्माण और राष्ट्रभक्ति की शिक्षा दी जाती है। शाखा से निकला स्वयंसेवक समाज में सेवा, संगठन और समर्पण की मिसाल बनता है।

पिछले सौ वर्षों में संघ ने हर क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ा है। आपदा प्रबंधन और राहत कार्य में संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे दिखाई देते हैं। बाढ़, भूकंप, सुनामी या महामारी—हर परिस्थिति में RSS कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों की सहायता की है। कोविड-19 महामारी के दौरान भी स्वयंसेवकों ने अस्पतालों में सेवा, मास्क और सैनिटाइज़र का वितरण तथा जरूरतमंदों तक भोजन पहुँचाने का कार्य किया।

संघ शिक्षा और सामाजिक उत्थान पर भी विशेष ध्यान देता है। इसके सहयोगी संगठनों द्वारा सैकड़ों विद्यालय, छात्रावास और संस्कार केंद्र चलाए जा रहे हैं। जनजातीय क्षेत्रों में वनवासी कल्याण आश्रम जैसी संस्थाओं के माध्यम से आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया गया है। महिलाओं के उत्थान के लिए भी ‘राष्ट्रीय सेविका समिति’ कार्य कर रही है।

RSS की विचारधारा “एक राष्ट्र, एक समाज और एक संस्कृति” की भावना पर आधारित है। इसका मानना है कि भारत की विविधता में एकता ही सबसे बड़ी ताकत है। स्वयंसेवक जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय भेदभाव से ऊपर उठकर समाज को संगठित करने का काम करते हैं।

संघ का योगदान केवल सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने राजनीति, शिक्षा, कला, खेल और उद्योग जगत तक में प्रेरणा दी है। आज संघ से प्रेरित कई संगठन देश के अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं। भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, विद्यार्थी परिषद और सेवा भारती जैसे संगठन समाज के विभिन्न वर्गों के बीच काम कर रहे हैं।

संघ के भीतर एक विशेष अनुशासन और त्याग की परंपरा है। स्वयंसेवक अपना निजी जीवन सरल रखते हुए समाज को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि लाखों लोग बिना किसी वेतन या लाभ की अपेक्षा किए, केवल राष्ट्रसेवा की भावना से संघ से जुड़े रहते हैं।

आलोचनाओं के बावजूद RSS की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। देश-विदेश में फैले भारतीय समाज ने इसे अपनाया है। आज संघ का विस्तार 60 से अधिक देशों तक हो चुका है। प्रवासी भारतीय समुदाय में भी इसकी शाखाएँ संचालित होती हैं, जो भारतीय संस्कृति और संस्कारों को जीवित रखने का कार्य करती हैं।

आजादी के बाद से लेकर आज तक RSS ने यह सिद्ध किया है कि वह केवल एक संगठन नहीं बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की शक्ति है। उसके स्वयंसेवक हर परिस्थिति में सेवा, समर्पण और संगठन की मिसाल प्रस्तुत करते हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की उस धारा का प्रतीक है जो “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श को जीती है और राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हुए एक सशक्त, आत्मनिर्भर और संस्कारित भारत की दिशा में कार्यरत है।

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