
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच सोमवार को घरेलू सर्राफा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। आमतौर पर युद्ध या अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान निवेशक सुरक्षित निवेश के रूप में सोने-चांदी की ओर रुख करते हैं, लेकिन इस बार बाजार का रुख अलग देखने को मिला है। निवेशक कीमती धातुओं की बजाय नकदी को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके चलते दोनों धातुओं के दाम दबाव में हैं।
इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 24 कैरेट सोने की कीमत में 3,470 रुपए प्रति 10 ग्राम की गिरावट आई है। इसके बाद सोने का भाव घटकर 1.51 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम रह गया है। वहीं चांदी की कीमत में 15,748 रुपए प्रति किलोग्राम की बड़ी कमी दर्ज की गई और इसका भाव 2.41 लाख रुपए प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया।
आंकड़ों के मुताबिक, 31 दिसंबर 2025 को सोने की कीमत 1.33 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम थी। इसके बाद लगातार तेजी के दौर में 29 जनवरी 2026 को सोना 1.76 लाख रुपए के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। हालांकि इसके बाद बाजार में बिकवाली बढ़ने से सोने के दाम में लगातार नरमी देखने को मिली और अब तक यह करीब 25 हजार रुपए सस्ता हो चुका है।
चांदी में भी इसी तरह का उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वर्ष 2025 के अंतिम दिन चांदी का भाव 2.30 लाख रुपए प्रति किलोग्राम था, जो 29 जनवरी को बढ़कर 3.86 लाख रुपए प्रति किलोग्राम के ऑलटाइम हाई स्तर पर पहुंच गया था। इसके बाद से अब तक चांदी की कीमत में करीब 1.45 लाख रुपए की गिरावट आ चुकी है। केवल जून महीने के शुरुआती आठ दिनों में ही चांदी 22 हजार रुपए प्रति किलोग्राम तक सस्ती हो गई है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण निवेशकों का नकदी की ओर झुकाव है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण निवेशक अपनी होल्डिंग बेचकर नकदी जमा कर रहे हैं। ऐसे समय में लिक्विड फंड को अधिक सुरक्षित माना जा रहा है, जिससे सोने और चांदी में बिकवाली बढ़ी है।
इसके अलावा, जनवरी में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद बड़े निवेशकों और संस्थागत फंडों द्वारा प्रॉफिट बुकिंग भी की गई। ऊंचे दामों पर बिकवाली बढ़ने से बाजार में सप्लाई बढ़ी और कीमतों पर दबाव बना। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम, डॉलर की चाल और केंद्रीय बैंकों की नीतियां सोने-चांदी की दिशा तय करेंगी।
फिलहाल निवेशकों की नजर मिडिल ईस्ट की स्थिति और वैश्विक बाजारों पर बनी हुई है। यदि तनाव और बढ़ता है तो कीमतों में फिर से तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।








