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जीवन में धैर्य का अमृत फल- डॉ ज्ञानानंददास स्वामी

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Written by
Rishabh Rai

मानव जीवन आज एक विचित्र मोड़ पर खड़ा है। आज हर किसी को जल्दी है। भागने और दौड़ने को युग का प्रवाह बताया जाता है। इंस्टेंट कोफ़ी, इंस्टेंट चाय, इंस्टेंट फ्रेंडशिप, इंस्टेंट विवाह, इंस्टेंट डायवोर्स यह सब अब सामान्य बनता जा रहा है। किन्तु क्या किसी ने सोचा है कि इस तेज प्रवाह में गुणवत्ता भी उसी तेजी से बढ़ रही है? विशेषकर मानवीय गुणों की गुणवत्ता? जी हाँ, कुछ ठहरकर सोचने और अंतर दृष्टि की आवश्यकता है। अँधेरे और दिशाहीन पथ पर दौड़ने से प्रकाश की मंजिल पाना कैसे संभव हो सकता है?

हाँ, इस प्रवाह में जो व्यक्ति धीरज का दीपक जलाकर चलता है, वही अन्ततः प्रकाश को प्राप्त करता है। धीरज केवल प्रतीक्षा नहीं, वह आत्मा की स्थिरता है; वह विश्वास है कि समय का प्रत्येक कण हमारे पक्ष में कार्य कर रहा है। अधीरता जहाँ क्षणिक संतोष देती है, वहीं धीरज जीवन की गहराइयों में उतरकर स्थायी सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।

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प्रकृति स्वयं धीरज का उपदेश देती है। बीज जब धरती में बोया जाता है, तो वह तुरंत वृक्ष नहीं बनता। उसे अंधकार, नमी, और समय; इन तीनों का सहारा लेना पड़ता है। यदि बीज अधीर हो जाए, तो वह अंकुरित ही न हो। परन्तु जो धैर्य रखता है, वही एक दिन विशाल वटवृक्ष बनकर छाया और फल देता है। इसी प्रकार मनुष्य का प्रयास भी धैर्य के बिना निष्फल हो जाता है।

आज का युग तीव्रता का युग है। हर व्यक्ति शीघ्र सफलता चाहता है, तुरंत परिणाम, त्वरित उपलब्धि। परन्तु यह भूल जाता है कि महान उपलब्धियाँ समय की गोद में ही जन्म लेती हैं। अधीरता हमें पथभ्रष्ट कर देती है, जबकि धीरज हमें सही दिशा में स्थिर रखता है। धीरज वह मौन शक्ति है, जो संघर्ष के क्षणों में भी हमें टूटने नहीं देती।

एक युवा छात्र हेमंत का उदाहरण बहुत प्रेरणादायी है। आई ए एस बनने का उसका सपना था। भारी कोशिश के बाद भी वह बार-बार परीक्षा में असफल हो रहा था। समाज की दृष्टि में वह असफल था, परिवार में भी निराशा का वातावरण था। परन्तु उसने धीरज को नहीं छोड़ा। हर असफलता को उसने अपने ज्ञान का आधार बनाया, हर निराशा को प्रेरणा में बदला। छठें प्रयास में उसने वही परीक्षा उत्तीर्ण की, और आज वह आई पी एस के रूप में देश की सेवा कर रहा है। यदि वह अधीर हो जाता, तो शायद वह अपने लक्ष्य से भटक जाता।

रामू किसान पुरुषार्थ करता था। पर वर्षा समय पर न होने से उसकी फसल बार-बार नष्ट हो जाती थी। गाँव के अन्य लोग शहर की ओर पलायन कर गए, परन्तु उसने अपने खेत को नहीं छोड़ा। उसने नए तरीके अपनाए, जल-संरक्षण किया और धैर्यपूर्वक परिश्रम करता रहा। कुछ वर्षों बाद उसकी भूमि ही सबसे उपजाऊ बन गई, और वही किसान दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया। धीरज ने उसे निराशा से निकालकर समृद्धि तक पहुँचा दिया।

धीरज का अर्थ केवल प्रतीक्षा करना नहीं है, अपितु सही दिशा में निरंतर प्रयास करते रहना है। यह वह शक्ति है, जो हमारे भीतर विश्वास को जीवित रखती है। जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल होती हैं, तब धीरज ही वह आधार बनता है, जिस पर हम अपने संकल्प को टिकाए रखते हैं।

महंत स्वामी महाराज कहते हैं- धीरज जीवन का वह अमृत है, जो असफलता के कड़वे अनुभवों को भी मधुर बना देता है। जो व्यक्ति धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करता है, भगवान स्वयं उसकी मदद करते हैं।

अतः, जब भी जीवन में बाधाएँ आएँ, निराशा घेरे, या सफलता दूर प्रतीत हो, तब यह स्मरण रखना चाहिए कि धीरज के फल वास्तव में मीठे होते हैं। जो प्रतीक्षा करना जानता है, वही फल प्राप्त करना भी जानता है।

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