
अंधविश्वास की एक अलग ही दुनिया है। हालाँकि, अंधविश्वास को समझना उतना आसान नहीं है, जितना अंधविश्वास में पड़ना। समाज में अंधविश्वास की कई अलग-अलग भाषाएँ और परिभाषाएँ प्रचलित हैं।
भगवद्गोमंडल और अन्य शब्दकोश भी संदेह और भ्रम के रूप में अंधविश्वास की व्याख्या करते हैं। यह परिभाषा अधिक व्यापक लगती है। इस प्रकार अंधविश्वास में पड़ना संदेह या भ्रम के आधार पर आचरण और विचार को अपनाना है। अंधविश्वास में मनुष्य भूत, वर्तमान और भविष्य की आपदाओं को टालने के लिए एक ऐसा तरीका और नीति का अभ्यास करता है, जिसमें शास्त्र, सिद्धांत और धार्मिकता का मूल नहीं होता है।“अंधविश्वास का कोई इलाज नहीं है,” जैसे वाक्य इसकी व्यापकता को दर्शाते है। विज्ञान की सीमा से बाहर आज भी ऐसे अनेक मनगढंत रिवाज व्यापक हो हैं। सबसे विकसित और समृद्ध देश भी इसके दायरे में हैं।
अणुवैज्ञानिक नील बोर ई.स.1922 के नोबल पारितोषित विजेता थे। वे भी एक विशेष अंधश्रद्धा के शिकार थे। नील बोर अपने घर के बाहर घोड़े की नाल लटका कर रखते। किसी-ने उनसे पूछा, “अंधश्रद्धा क्यों? तो नील बोर ने कहा, “ये अंधश्रद्धा नहीं है, शुभ चिह्न है।“
अमेरिका में लोग 13 नंबर को अशुभ मानते हैं। वहाँ कई घरों में बारहवीं मंजिल के ठीक बाद चौदहवीं मंजिल होती है, और कुछ एयरलाइंस में 13 नंबर की सीट ही नहीं होती। जापान में तो 4 नंबर को अशुभ माना जाता है। बुल्गारिया के सोफियाना में एक सरोवर को छुनेवाला व्यक्ति पूरे वर्ष स्वस्थ रहता है, इस मान्यता से लोग ठंडे पानी में डुबकी लगाते हैं। निस्संदेह इन देशों में अंधविश्वास की आग है किन्तु वह केवल मानसिक पीड़ा देती है, लेकिन वहाँ अंधविश्वास विकास में कम ही बाधक होता है।
भारत में कोई विधवा बहन सामने मिले तो कुछ लोग अपशुकन मानते हैं । बिल्ली सामने आ जाए तो रास्ता बदल दिया जाता है। घर से बाहर निकलते हुए छींक आने पर बाहर जाना परहेज करते हैं। नई कार या घर लेते हैं तो नजर ना लगे इसलिए नींबू और मिर्च लटकाते हैं। घर की दहलीज पर कोई घोड़े की नाल या मंत्रित गुड़िया लटकती रहती है। पैर मायाजाल में गिर गया, पहले बाएं पैर को बाहर निकालने से दुःख आया, इस तरह के अनेक अंधविश्वास से हम मानसिक रूप से अस्थिर और शारीरिक रूप से गरीब बनते हैं।
ऐसे अशुभ-शुभ या छींक-बील्ली जैसे खूंटे पर जिंदगी लटकाकर हजारों लोगों ने लाखों अवसर गवाए हैं, लाखों लोगों ने अंधविश्वास की ऐसी जेल में लाखों घंटे बिताए हैं। अधिक दु:ख तब होता है जब आस्था और अध्यात्म की आड़ में अंधविश्वास को पुष्ट किया जाता है। यह दो तरह से घातक है। एक तरफ तो गरीब लोग भी धर्म के झण्डे तले अंधश्रद्धा की रस्म में लाखों रुपये खर्च करने से नहीं हिचकिचाते, और दूसरा नई पीढ़ी में आध्यात्मिक आस्था की गुमनामी पैदा हो जाती है।
सच में यहाँ अंधविश्वास आस्था की भूमि से जीवनरस लेकर अंधविश्वास का फूल खिलाता है। चूंकि हमारे देश में भावुक और श्रद्धालु लोग अत्यधिक हैं। अत: अंधविश्वास की प्रचुर फसल भावनात्मक रूप से उपजाऊ हृदय पर अंधविश्वास का विपुल फल खिलने में देर नहीं लगती। लालच भी अंधविश्वास के लिए उपजाऊ जमीन प्रदान करता है। हमारे यहाँ कहावत है, ‘जहाँ लोभ होगा, वहाँ धोखेबाज भूखे नहीं रहेंगे’। रातों-रात अमीर बनने का सपना लालच का ही एक रूप है। इन लालची आदमियों को टोटकों पर सरलता से भरोसा हो जाता है। और कुछ पेशेवर दुर्जन सीधे ऐसे लालची आदमियों के पास आ ही जाते हैं। लगा तो तीर नही तो, तुक्के जैसी बात यहाँ कभी-कभार सच हो जाती है।
इसलिए प्रमुखस्वामी महाराज ने हरिभक्तों से कहा था- “भगवान के अलावा कोई किसी को मारने, जीवन देने या दुःख देने के लिए समर्थ नही है, अगर इन मंत्र मारने वालों का बस चलता, तो राजा सेना क्यों रखता? एक मान्त्रिक ही रख न लेते? इसलिए निर्भय बनो और भगवान को सर्वशक्तिमान मानकर उनकी पूजा करो। यही सच्ची आस्था है। सभी धर्मों की यही राय है कि हमें छोटी-छोटी बातों से डरना बंद कर एक भगवान में अपनी आस्था को मजबूत करना चाहिए।“ इस प्रकार स्वामीजी ने गाँव-गाँव घर-घर जाकर लोगों को अंधविश्वास से मुक्त किया था। वे लोगों को सच्ची समझ देकर उन्हें कर्मठता और सच्ची भक्ति की शिक्षा देते थे।

अंधविश्वास का दायरा: डॉ ज्ञानानंद दास स्वामी">






