
हमारे प्राचीन शास्त्र कहते हैं कि यह संसार केवल रहने का स्थान नहीं है-वास्तव में यह मृत्यु का ही क्षेत्र है। इसलिए इस दुनिया को मृत्युलोक भी कहा जाता है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यह अस्तित्व का अटल नियम है। फिर भी, ‘मृत्यु’ शब्द का मात्र उल्लेख ही लोगों के मन में भय उत्पन्न कर देता है। जब केवल इसका नाम सुनकर ही डर लगता है, तो वास्तविक मृत्यु का अनुभव कितना भयावह होगा-यह सहज ही समझा जा सकता है।
जीवन में मनुष्य अनेक दुखों, तनावों और कठिनाइयों का सामना करता है, लेकिन सबसे गहरा और प्रभावशाली भय ‘मृत्यु का भय’ ही है। महाभारत में जब यक्ष ने युधिष्ठिर से सबसे बड़ा आश्चर्य पूछा, तो उन्होंने उत्तर दिया: प्रतिदिन लोग जन्म और मृत्यु को देखते हैं, फिर भी वे ऐसे व्यवहार करते हैं मानो वे हमेशा जीवित रहेंगे। निस्संदेह, कोई भी मरना नहीं चाहता। हर कोई इस भय से घिरा हुआ है। परंतु यह भय क्यों बना रहता है? यह मन को इतनी मजबूती से क्यों जकड़ लेता है?
एक बार एक मकान मालिक ने दो भाइयों को किराए के घर से निकाल दिया। एक भाई रोने लगा, जबकि दूसरा शांत और प्रसन्नचित्त होकर सामान समेटने लगा। जब उससे कारण पूछा गया, तो उसने कहा, ‘मुझे हमेशा पता था कि यह घर अस्थायी है-किराए का है। एक दिन इसे छोड़ना ही होगा। फिर दुख कैसा?
यह छोटी-सी कहानी एक गहरा सत्य बताती है। भय से मुक्त होने की कुंजी है-सच्चा ज्ञान। आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का ज्ञान ही भय को समाप्त कर सकता है। जैसा कि अक्षरब्रह्म गुणातीतानंद स्वामी ने कहा है, ज्ञान के बिना, छोटी-सी हानि या किसी प्रियजन की मृत्यु भी व्यक्ति को विचलित कर सकती है। इसलिए ऐसा ज्ञान प्राप्त करो, जिससे दुख तुम्हें अभिभूत न कर सके।
सच्चा ज्ञान ही सच्ची निर्भयता देता है। यह व्यक्ति को संकट के समय भी स्थिर और संयमित रहने की शक्ति देता है। यह मन में ऐसी आंतरिक दृढ़ता पैदा करता है, जिससे वह संदेह, संकट और निराशा का सामना स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ कर सके। ऐसी निर्भयता सामान्य नहीं, बल्कि दिव्य गुण है।
भागवत गीता के 16वें अध्याय दैवासुर सम्पद् विभाग योग का पहला शब्द ही ‘अभयम्’ (निर्भयता) है।
भगवान स्वामीनारायण ने वचनामृत में बताया है कि निर्भय बनने के लिए मनुष्य को निरंतर यह चिंतन करना चाहिए- मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मृत्यु का समय एक महासागर के समान है, जिसे पार करने के लिए भगवान की भक्ति रूपी नाव आवश्यक है। अंत समय में केवल भगवान का दृढ़ आश्रय ही सहायक होता है’
यह भक्ति क्या है? सत्संग दीक्षा के अनुसार, सच्चे गुरु का संग ही भक्ति है-ऐसे गुरु का, जो शास्त्रों में वर्णित संत गुणों से युक्त हो। ऐसा संत हमें आत्मा और परमात्मा का ज्ञान प्रदान करता है। उसके सान्निध्य में सबसे बड़ा भय-मृत्यु का भय-भी समाप्त हो जाता है।
इस दिव्य निर्भयता का जीवंत उदाहरण प्रमुख स्वामी महाराज के जीवन में देखा जा सकता है। एक बार विदेश यात्रा के दौरान उन्हें आतंकवादी खतरे की चेतावनी दी गई। लोगों ने उन्हें यात्रा न करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से कहा, ‘तुम्हें आतंकवादियों पर विश्वास है, क्या भगवान पर नहीं? भगवान हमारे रक्षक हैं’। और वे निडर होकर यात्रा पर निकल पड़े।
जो लोग राजसिक और तामसिक कर्मों में लगे रहते हैं, वे हमेशा मृत्यु के भय में जीते हैं। यहां तक कि सात्विक कर्म करने वाले भी कभी-कभी मृत्यु के बाद के भविष्य को लेकर असमंजस में रहते हैं। लेकिन जो व्यक्ति गुणातीत गुरु का आश्रय लेता है, वह इस भय से मुक्त हो जाता है।
अतः हमें इस सच्ची निर्भयता के मार्ग को अपनाना चाहिए। गुरु का आश्रय लें, ज्ञान प्राप्त करें और अपने जीवन को भगवान की भक्ति में केंद्रित करें। क्योंकि उस दिव्य आश्रय में मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और उसकी जगह शांति, साहस और मोक्ष का प्रकाश प्रकट होता है।

गुरु के आश्रय से अभय तक: जीवन और मृत्यु का गूढ़ रहस्य- डॉ. ज्ञानानंद दास स्वामी">








