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स्मार्ट सिटी के दावे, गटर और कचरे में जनता की जिंदगानी

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Written by
Rishabh Rai

देश की राजधानी दिल्ली का किराड़ी इलाका आज एक गंभीर सवाल बन चुका है- क्या यह इलाका सरकार की नजरों में दिल्ली का हिस्सा नहीं है? कचरे के ढेर, खुले गटर, बदबू से भरी हवा और सड़कों पर बहता सीवर का पानी… यह तस्वीर किसी दूर-दराज के उपेक्षित गांव की नहीं, बल्कि दिल्ली के एक रिहायशी इलाके की है। और यह सब उस समय हो रहा है, जब दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सुशासन और स्वच्छ राजधानी के दावे कर रही हैं।

किराड़ी के हालात केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सत्ता की संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुके हैं। यहां रहने वाले लोग पूछ रहे हैं- क्या हमें मरने के लिए छोड़ दिया गया है? बच्चों को स्कूल भेजना मुश्किल है, बुजुर्ग घरों में कैद हैं और महिलाएं बदबू व गंदगी के बीच रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। मच्छरों की भरमार से डेंगू और मलेरिया का खतरा लगातार मंडरा रहा है, लेकिन सरकार और नगर निगम की नींद नहीं टूट रही।

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सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से है। क्या उन्हें किराड़ी के हालात की जानकारी नहीं है? या फिर यह इलाका उनकी प्राथमिकताओं की सूची में ही नहीं आता? अगर जानकारी है और फिर भी हालात जस के तस हैं, तो यह सीधी तौर पर शासन की नाकामी है। और अगर जानकारी नहीं है, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

सरकारें योजनाओं और विज्ञापनों में करोड़ों खर्च कर सकती हैं, लेकिन किराड़ी की टूटी नालियों, भरे गटर और कचरे के पहाड़ हटाने के लिए बजट और इच्छाशक्ति दोनों गायब हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं, अधिकारी आते हैं, फोटो खिंचते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। यही दिल्ली का “गवर्नेंस मॉडल” है?

रेखा गुप्ता को यह समझना होगा कि किराड़ी भी दिल्ली है। यहां रहने वाले लोग भी टैक्स देते हैं, वोट देते हैं और सम्मानजनक जीवन के हकदार हैं। स्वच्छता केवल वीआईपी इलाकों या कैमरे के सामने साफ दिखने वाली सड़कों तक सीमित नहीं हो सकती।

अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो किराड़ी सिर्फ बदबू और बीमारी का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि जनता के गुस्से का प्रतीक बन जाएगा। मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे खुद मौके पर जाएं, अफसरों से रिपोर्ट नहीं, जवाब मांगें और स्थायी समाधान लागू करें।

किराड़ी को ‘नर्क’ बनाने वाली यह चुप्पी अब टूटनी चाहिए। क्योंकि शासन का असली चेहरा वहीं दिखता है, जहां हालात सबसे बदतर होते हैं- और फिलहाल दिल्ली में वह चेहरा किराड़ी है।

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