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तारिक रहमान की भारत नीति: राष्ट्रवाद और व्यावहारिकता का संतुलन

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Written by
Rishabh Rai

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान की 17 वर्षों के लंदन निर्वासन के बाद 25 दिसंबर 2025 को ढाका वापसी एक ऐतिहासिक घटना है। लाखों समर्थकों ने उनका स्वागत किया, और फरवरी 2026 के चुनावों से पहले यह बीएनपी के लिए बड़ा बढ़ावा है। तारिक ने अपनी वापसी के पहले भाषण में सभी समुदायों—हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, ईसाई—के लिए सुरक्षित बांग्लादेश बनाने का वादा किया। उन्होंने कानून-व्यवस्था बहाल करने, धार्मिक सद्भाव और युवाओं की भागीदारी पर जोर दिया। मार्टिन लूथर किंग जूनियर की ‘आई हैव ए ड्रीम’ से प्रेरित होकर उन्होंने कहा, “मेरे पास अपने देश के लिए एक योजना है।”

भारत के नजरिए से तारिक की सोच “बांग्लादेश फर्स्ट” पर टिकी है। पहले के बयानों में उन्होंने कहा था—न दिल्ली, न पिंडी, बल्कि बांग्लादेश पहले। तीस्ता जल बंटवारे में अपना हिस्सा मांगते हुए उन्होंने फेलानी हत्याकांड जैसी सीमा घटनाओं की आलोचना की। शेख हसीना को शरण देने पर भारत की निंदा करते हुए बोले कि यदि भारत ऐसा करके बांग्लादेशी जनता की नाराजगी मोल लेता है, तो इसके लिए हम जिम्मेदार नहीं। बीएनपी का इतिहास भारत के साथ ठंडा रहा है, और 2001-2006 के शासन में भी संबंध उतने मजबूत नहीं थे जितने अवामी लीग के समय।

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फिर भी, वापसी के भाषण में भारत का सीधा उल्लेख नहीं था। बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन तोड़ा और खुद को केंद्रवादी पार्टी के रूप में पेश किया। अंतरिम सरकार के कार्यकाल में पाकिस्तान से निकटता और कट्टरपंथी उभार के बीच तारिक का समावेशी संदेश भारत के लिए राहत की बात है। मोदी सरकार की खालेदा जिया की सेहत पर चिंता और समर्थन पर बीएनपी की सकारात्मक प्रतिक्रिया से संवाद के दरवाजे खुले दिखते हैं। यदि बीएनपी सत्ता में आती है, तो व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत के साथ व्यावहारिक संबंध जरूरी होंगे। तारिक की राष्ट्रवादी सोच सत्ता की जिम्मेदारी में संतुलित हो सकती है। भारत को सतर्क रहते हुए संवाद बढ़ाना चाहिए, क्योंकि अस्थिर बांग्लादेश क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है

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