
जब इस्लामाबाद में दुनिया की निगाहें टिकी हों, जब ईरान और अमेरिका जैसे प्रतिद्वंद्वी देश बातचीत की मेज पर आने को तैयार हों, और जब पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में मेजबान और संभावित मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा हो- तब स्वाभाविक रूप से एक सवाल उठता है: इस पूरे परिदृश्य में भारत कहां है?
भारत ने पिछले एक दशक में खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने का भरपूर प्रयास किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने जी-20 जैसे मंचों की मेजबानी की, वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने की कोशिश की और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सक्रिय भागीदारी का दावा किया। लेकिन इस्लामाबाद में प्रस्तावित यह वार्ता उस दावे की एक कठिन परीक्षा बनकर सामने आई है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत किसी बड़े कूटनीतिक मंच से अनुपस्थित दिखा हो, लेकिन इस बार मामला अलग है। यह बातचीत ऐसे क्षेत्र से जुड़ी है, जिसका सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और रणनीतिक हितों पर पड़ता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरने वाला तेल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अगर वहां तनाव बढ़ता है या सप्लाई बाधित होती है, तो इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत ने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा है, या उसे किनारे कर दिया गया है? दोनों ही स्थितियां चिंता पैदा करती हैं। अगर भारत खुद दूर है, तो यह उसकी कूटनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है। और अगर उसे शामिल नहीं किया गया, तो यह उसकी वैश्विक प्रभावशीलता पर।
दूसरी ओर, पाकिस्तान का इस भूमिका में उभरना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिस देश को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संदेह की नजर से देखा गया, वही आज एक महत्वपूर्ण बातचीत का केंद्र बन रहा है। यह बदलाव केवल पाकिस्तान की सक्रियता का परिणाम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में हो रहे बदलाव का संकेत भी है।
भारत की कूटनीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांत पर आधारित रही है। लेकिन आज के दौर में, जहां वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है, वहां केवल संतुलन बनाकर चलना पर्याप्त नहीं है। सक्रिय भागीदारी और समय पर हस्तक्षेप भी उतना ही जरूरी है।
यह भी संभव है कि भारत पर्दे के पीछे अपनी भूमिका निभा रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में दृश्य उपस्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। संदेश वही जाता है, जो दिखता है। और फिलहाल जो दिख रहा है, वह यह कि इस्लामाबाद में चल रही इस बड़ी कूटनीतिक प्रक्रिया में भारत की भूमिका स्पष्ट नहीं है।
यह स्थिति भारत के लिए आत्ममंथन का अवसर है। क्या ‘ग्लोबल लीडर’ बनने का दावा केवल मंचों और भाषणों तक सीमित है, या वह वास्तविक कूटनीतिक प्रभाव में भी दिखाई देता है? इस्लामाबाद टॉक्स इस सवाल का जवाब मांग रहे हैं।






