
कैश कांड में नाम आने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देकर पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजा है। शुक्रवार को लिए गए इस फैसले ने न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में चल रही हलचल को और तेज कर दिया है।
यह मामला उस समय सामने आया था जब 15 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास से कथित तौर पर जले और अधजले 500 रुपये के नोट बरामद हुए थे। इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद न्यायमूर्ति वर्मा पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। हालांकि, उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक साजिश बताया था। इसके बावजूद मामला लगातार तूल पकड़ता गया और अंततः संसद तक पहुंच गया।
विवाद बढ़ने के बाद न्यायपालिका के भीतर भी हलचल शुरू हुई। भारत के मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में 22 मार्च 2025 को एक आंतरिक जांच समिति गठित की गई। इस समिति में उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों को शामिल किया गया था, जिन्हें पूरे मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया। जांच प्रक्रिया के बीच ही सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने वर्मा का तबादला दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट करने की सिफारिश की, जिसे केंद्र सरकार ने मंजूरी दे दी।
इसके बाद 5 अप्रैल 2025 को जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की। हालांकि, उनके ट्रांसफर को लेकर भी सवाल उठे और कानूनी समुदाय के भीतर इस निर्णय को लेकर मतभेद सामने आए। कई लोगों का मानना था कि जांच पूरी होने से पहले स्थानांतरण उचित नहीं था, जबकि कुछ ने इसे प्रशासनिक निर्णय बताया।
इसी बीच मामला संसद में भी जोर पकड़ने लगा। बीते साल मानसून सत्र के दौरान 145 लोकसभा सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की पहल की। इस प्रस्ताव को सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सांसदों का समर्थन मिला। इसमें प्रमुख नेताओं जैसे अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और केसी वेणुगोपाल सहित कई सांसदों ने हस्ताक्षर किए।
संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 218 के तहत यह महाभियोग प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। सांसदों का कहना था कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है और न्यायपालिका की साख बनाए रखने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।
हालांकि, महाभियोग प्रक्रिया पूरी तरह आगे बढ़ पाती, उससे पहले ही जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देकर स्थिति बदल दी। उनके इस कदम को कई जानकार महाभियोग की संभावित कार्रवाई से बचने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह नैतिक जिम्मेदारी के तहत लिया गया फैसला हो सकता है।
फिलहाल, उनके इस्तीफे के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि चल रही आंतरिक जांच का क्या होगा और क्या भविष्य में इस मामले में कोई और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह पूरा घटनाक्रम न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दे चुका है, जिसका असर आने वाले समय में भी देखने को मिल सकता है।





