
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन साल पहले 2028 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP33) की मेजबानी का प्रस्ताव रखने के बाद भारत ने अब इसे वापस ले लिया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने इस महीने ही सम्मेलन की मेजबानी न करने के अपने निर्णय की जानकारी दे दी। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय ने अभी तक इस फैसले की सार्वजनिक घोषणा नहीं की है, लेकिन इस कदम ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई और भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्लाइमेट होम न्यूज़ के अनुसार, एशिया-प्रशांत समूह के अध्यक्ष को भेजे गए एक पत्र में भारत ने बताया कि उसने 2028 में अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया है। पत्र में कहा गया कि भारत जलवायु कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ा रहेगा और सम्मेलन के लिए अपनी उम्मीदवारी के दौरान एशिया-प्रशांत देशों के समर्थन और एकजुटता की सराहना करता है। रजत अग्रवाल, जो संयुक्त राष्ट्र परिषद (UNFCCC) के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए जिम्मेदार पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी हैं, ने इस पत्र के माध्यम से इस निर्णय की जानकारी साझा की।
प्रधानमंत्री मोदी ने 2023 में दुबई में आयोजित COP28 में भारत को 2028 में COP33 की मेजबानी के लिए प्रस्तावित किया था। इस सम्मेलन में 197 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। मोदी ने अपने संबोधन में वैश्विक ग्रीन क्रेडिट पहल शुरू करने की घोषणा की, जो पर्यावरण-हितैषी स्वैच्छिक पहलों पर केंद्रित है। उन्होंने विकसित देशों से वैश्विक दक्षिण को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी प्रदान करने का भी आग्रह किया। उस समय भारत के प्रस्ताव को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी, और इसके बाद जुलाई 2025 में भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने COP33 की मेजबानी की तैयारी के लिए समर्पित टीम “COP33 सेल” की स्थापना की थी।
हालांकि, अब यह पहल पीछे हट गई है। भारत के पीछे हटने के कारण स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह निर्णय कई तरह के व्यावहारिक और रणनीतिक विचारों का परिणाम हो सकता है। पहली संभावना यह है कि भारत अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं की समीक्षा कर रहा था और यह सुनिश्चित करना चाहता था कि वह सम्मेलन की मेजबानी के समय पूरी तरह तैयार हो। दूसरी संभावना यह है कि लॉजिस्टिक और वित्तीय दबावों ने भी इस निर्णय को प्रभावित किया होगा। COP जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भारी संसाधन, सुरक्षा व्यवस्था और प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
COP33 की मेजबानी अब अनिश्चित हो गई है। दक्षिण कोरिया ने पहले जियोलनाम-डो प्रांत में इस सम्मेलन की मेजबानी करने की इच्छा जताई थी, लेकिन सरकार ने अभी तक औपचारिक रूप से अपनी रुचि नहीं दिखाई है। इसके अलावा, दक्षिण कोरिया 2028 में G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा, जो उनकी प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है। इस साल COP31 की सह-मेजबानी तुर्की और ऑस्ट्रेलिया करेंगे, जबकि अगले वर्ष का आयोजन इथियोपिया में होगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का यह कदम वैश्विक जलवायु मंच पर उसकी छवि पर असर डाल सकता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जलवायु पहल और स्वच्छ ऊर्जा में तेजी दिखाई है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी सक्रियता बनाए रखी है। COP33 की मेजबानी छोड़ने से कुछ आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या भारत अपनी भूमिका को पूरी तरह निभाने के लिए तैयार है। हालांकि, पत्र में भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह जलवायु कार्रवाई में सक्रिय रहेगा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जारी रखेगा।
वहीं, पर्यावरण और जलवायु विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत के इस कदम के पीछे घरेलू प्राथमिकताएं भी हो सकती हैं। बड़ी परियोजनाओं की तैयारी, वित्तीय प्रबंधन और स्थानीय संसाधनों का ध्यान रखना किसी भी देश के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। COP33 जैसे आयोजन के दौरान हजारों अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मेजबानी, सुरक्षा और कार्यक्रम प्रबंधन की जिम्मेदारी भारी होती है। इसलिए इसे स्थगित करने या उम्मीदवारी वापस लेने के पीछे व्यावहारिक कारण भी हो सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, COP33 की मेजबानी अब किसी अन्य देश को सौंपनी होगी। यह निर्णय वैश्विक जलवायु चर्चा और सहयोग की दिशा को प्रभावित कर सकता है। भारत के कदम के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सा देश इस महत्वपूर्ण सम्मेलन की मेजबानी करेगा और वैश्विक जलवायु एजेंडा पर कैसे असर पड़ेगा।






