
जीवन की राह में सफलता–निष्फलता दोनों ही सहज हैं। किन्तु क्षणिक असफलता मनुष्य को ऐसा प्रतीत कराती है मानो समूचा आकाश ही उस पर टूट पड़ा हो। वह रुक जाता है, बैठ जाता है, और फिर अपनी ही दुर्बलताओं के आँसू बहाने लगता है। परंतु क्या यही जीवन है? क्या मनुष्य का जन्म केवल शिकायत करने, परिस्थितियों को दोष देने और समय को यूँ ही व्यर्थ गंवाने के लिए हुआ है?
आज का मनुष्य विचित्र द्वंद्व में जी रहा है। उसे तुच्छ बातों में भी अपमान दिखाई देता है, साधारण बाधाओं में भी वह विद्रोह का स्वर खोज लेता है। छोटी-छोटी असुविधाएँ उसके भीतर असंतोष का ज्वार उत्पन्न कर देती हैं। वह अपने कर्तव्य से विमुख होकर आंदोलनों और विरोधों में उलझ जाता है, पर यह भूल जाता है कि इन सबके बीच उसका अमूल्य समय धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है। वह स्वयं से प्रश्न नहीं करता कि जो ऊर्जा वह रोष में खर्च कर रहा है, क्या वही ऊर्जा यदि सृजन में लगाई जाए तो जीवन कितना उज्ज्वल हो सकता है?
रोना सरल है, संघर्ष कठिन। शिकायत करना सहज है, समाधान खोजना दुष्कर। किंतु मनुष्य की गरिमा उसी में है कि वह कठिन को अपनाए, दुष्कर को साधे और अपने भीतर के प्रकाश को जगाए। आँसू केवल दृष्टि को धुँधला करते हैं, जबकि साहस दृष्टि को विस्तृत करता है। जो व्यक्ति हर क्षण विलाप करता है, वह अपने ही भीतर की शक्ति को खो देता है। और जो मौन रहकर आगे बढ़ता है, वही इतिहास के पृष्ठों पर अपनी छाप अंकित करता है।
जीवन का सत्य यह है कि बाधाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं। यदि एक समस्या सुलझती है, तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। ऐसे में यदि मनुष्य हर बार रोने लगे, तो वह कभी आगे बढ़ ही नहीं पाएगा। इसलिए आवश्यक है कि वह अपने मन को दृढ़ बनाए। धैर्य को अपना सहचर बनाए और अपने लक्ष्य की ओर अविचल गति से चलता रहे। यह धैर्य ही है जो तूफानों के बीच दीपक को जलाए रखता है, और यही साहस है जो अंधकार में भी दिशा दिखाता है।
जो लोग तुच्छ बातों में उलझकर समय गंवाते हैं, वे जीवन के महान अवसरों को खो देते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और जो उसके साथ नहीं चलता, वह पीछे छूट जाता है। इसलिए अब समय है कि हम अपने भीतर की दुर्बलता को त्यागें। अपनी दृष्टि को व्यापक बनाएं और अपने कर्म को ऊँचा उठाएं।
अपने आप से कहो- ‘उठो, अब रोना बंद करो।’ अपनी आँखों के आँसुओं को पोंछो और अपने हृदय में साहस का संचार करो। यह संसार उन लोगों का नहीं है जो हार मान लेते हैं, बल्कि उनका है जो हर हार को एक नई शुरुआत में बदल देते हैं। अपने भीतर की शक्ति को पहचानो, उसे जागृत करो और आगे बढ़ो।
रोना मनुष्य की स्वाभाविक भावना है। परंतु जब रोना आदत बन जाता है, तो व्यक्तित्व की कमजोरी बन जाता है। लेकिन संसार भावनाओं से अधिक दृढ़ता पर विश्वास करता है। लोग उसी पर भरोसा करते हैं जो संकट के समय स्थिर रहता है, जो आँधियों में भी खड़ा रह सके।
याद रखो, जीवन एक महान अवसर है। इसे तुच्छ शिकायतों में व्यर्थ मत करो। अपने लक्ष्य को स्पष्ट करो, अपने संकल्प को दृढ़ करो और धैर्य के साथ आगे बढ़ते रहो। जो आज तुम्हें रोक रहा है, वही कल तुम्हारी शक्ति बन सकता है, यदि तुम उसे सही दृष्टि से देखो। महंत स्वामी महाराज कहते हैं- अब समय विलाप का नहीं, निर्माण का है। यह समय शिकायत और दोषारोपण का नहीं, आगे बढ़ने का है।

अब रोना बंद करो- डॉ ज्ञानानंददास स्वामी">







