
आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में तेल का खेल सिर्फ ऊर्जा का नहीं, बल्कि मुद्रा की सत्ता का भी है। 1970 के दशक में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए समझौते ने तेल की कीमत डॉलर में तय करने की परंपरा शुरू की, जिसे पेट्रोडॉलर कहा जाता है। इस व्यवस्था से दुनिया भर के देश तेल खरीदने के लिए डॉलर जमा करते हैं, जिससे अमेरिका को असीमित डॉलर छापने की सुविधा मिलती है। बिना किसी बड़े संकट के अमेरिकी अर्थव्यवस्था चलती रहती है। लेकिन यह सत्ता अब चुनौती का सामना कर रही है, खासकर चीन और ब्रिक्स देशों से, जो डॉलर की निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
वेनेजुएला इस खेल में महत्वपूर्ण खिलाड़ी है। दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार (लगभग 300 अरब बैरल) वाले इस देश का तेल भारी और सस्ता है। निकोलस मादुरो की सरकार ने चीन के साथ गहरे संबंध बनाए। चीन वेनेजुएला का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, और दोनों देश डॉलर से बाहर व्यापार करने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। पेट्रोयुआन की अवधारणा और ब्रिक्स के डी-डॉलराइजेशन प्रयासों में वेनेजुएला की भूमिका अहम थी। मादुरो की नीतियां अमेरिकी डॉलर की सत्ता को कमजोर करने वाली लग रही थीं, क्योंकि वेनेजुएला का तेल चीन को युआन या अन्य मुद्राओं में बेचा जा सकता था।
अमेरिका ने लंबे समय से वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाए हैं। पीडीवीएसए (वेनेजुएला की राज्य तेल कंपनी) पर सैंक्शंस, तेल निर्यात पर पाबंदियां और मादुरो पर नार्को-टेररिज्म के आरोप – ये सब डॉलर की रक्षा के लिए थे। लेकिन 3 जनवरी 2026 को अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया। अमेरिकी सेना ने काराकास पर बड़े पैमाने पर हमला किया और मादुरो तथा उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले गई। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका अब वेनेजुएला चला रहा है और अमेरिकी कंपनियां वहां के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी। ट्रंप ने साफ कहा कि वेनेजुएला के विशाल भंडार अब अमेरिकी कंपनियों के लिए खुले हैं, जो अरबों डॉलर निवेश करेंगी।
यह कार्रवाई सिर्फ मादुरो की तानाशाही या ड्रग तस्करी के खिलाफ नहीं लगती। असल में यह पेट्रोडॉलर की रक्षा है। वेनेजुएला का तेल अगर चीन के पेट्रोयुआन सिस्टम में जाता, तो डॉलर की मांग कम होती। अब अमेरिकी नियंत्रण से वेनेजुएला का तेल फिर डॉलर में बिकेगा, और चीन की पहुंच सीमित हो जाएगी। ट्रंप ने कहा कि चीन को तेल बेचा जाएगा, लेकिन अमेरिकी कंपनियां लाभ कमाएंगी। यह दिखाता है कि तेल के जरिए डॉलर की सत्ता बरकरार रखने की कोशिश है।
हालांकि यह हस्तक्षेप विवादास्पद है। अंतरराष्ट्रीय कानून की उल्लंघन, संप्रभुता पर हमला – रूस, ईरान और ब्राजील जैसे देशों ने निंदा की है। लेकिन अमेरिका के लिए यह रणनीतिक जीत है। दुनिया देख रही है कि डॉलर की सत्ता चुनौती देने वालों का क्या हश्र होता है।
क्या यह पेट्रोडॉलर युग का अंतिम बचाव है या नई बहुध्रुवीय दुनिया की शुरुआत? समय बताएगा, लेकिन साफ है कि सारा खेल तेल का है – और तेल के जरिए डॉलर की सत्ता का।









