सम्पादकीय: नकली दवाएं
हम भले 21वीं सदी में जी रहे हों लेकिन कोविड 19 से लड़ाई के दौरान अनेक ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने हमारी सभ्यता, मानवता और विकास पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं और इसमें आक्सीजन, वेंटीलेटर, रेमडेसिविर जैसी जरुरी दवाओं की कालाबाजारी और नकली दवाओं की बिक्री जैसी घटनाओं को भी रखा जाना चाहिए। अब हम धीरे-धीरे कोविड के खतरों से तो बाहर आ रहे हैं लेकिन कोविड की तीसरी लहर और ब्लैक फंगस जैसी बीमारियों का खतरा अभी भी मौजूद हैं। इनके इलाज में लगने वाली दवाओं और इंजेक्शंस की कालाबाजारी आज भी जारी है। इस कार्य में कलयुग के भगवान माने जाने वाले चिकित्सकों की गंभीर भूमिकाएं भी सामने आईं हैं जो अत्यंत चिंताजनक है। इस रविवार को ही दिल्ली पुलिस ने निजामुद्दीन इलाके में दो चिकित्सकों को उनके साथियों सहित गिरफ्तार किया है जो ब्लैक फंगस में काम आने वाले मंहगे इंजेक्शंस सहित भारी मात्रा में अन्य नकली दवाओं का उत्पादन कर महंगे दामों पर जरुरतमंदों को बेचते थे। कोशिश जैसी आपदा को अवसर बनाने वालों ने ना सिर्फ मानवता को शर्मसार किया बल्कि क़ानून और संविधान को भी ठेंगा दिखाया है। पिछले तीन महीने से कोरोना इलाज को लेकर बदहाल स्थिति देखने को मिली। पहले दवाइयों, मेडिकल ऑक्सीजन और उपकरणों की किल्लत हुई। ये किल्लत मुश्किल वक्त के लिए तैयारियों में कमी से तो उपजी ही थीं, मगर कालाबाजारियों ने भी इसे बढ़ाने का काम किया। जरूरी दवाओं और मेडिकल सप्लाई को सबसे मुश्किल वक्त में स्टॉक किया गया। किल्लत बताई गई और बाद में उसे मुंहमागी कीमतों पर ब्लैक मार्केट में बेंचा गया और इस मामले में सरकारी अमला भी थोडा नहीं बहुत देर से हरकत में आया।अनेक जगह तो पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत भी सामने आई।निजामुद्दीन की तर्ज पर ही महाराष्ट्र में एक गैंग के फर्जीवाड़े का पता चला। कई जगहों पर कैम्प के जरिए फर्जी कोरोना टीका लगाकर लोगों से पैसे वसूले जा रहे हैं। यह सरकार की व्यवस्थाओं को आईना तो दिखाता ही है इंसानियत को भी अंगूठा दिखाया है।
अगर कोविड की आपदा सामने नहीं आती तो यह कल्पना भी नहीं थी कि ऐसे लोग आज भी हैं जो सैकड़ों लोगों को मौत की खाई में झोंककर पैसा कम रहे हैं। फर्जी टीका लगाया गया, अलग-अलग अस्पतालों के फर्जी टीका सर्टिफिकेट भी बांटे गए। जैसे टीका लगाने के बाद सरकार देती है। ये सबकुछ किसी दूर-दराज इलाके में नहीं बल्कि मुंबई – दिल्ली जैसे महानगरों में हो रहा है। हैरान करने वाली बात है कि सरकारी अमलों को बंदरबाट की भनक तक नहीं है अथवा वे चुप्पी मारे हैं। इन भयावह घटनाओं से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कालाबाजारियों को काबू करने में हमारा क़ानून प्रभावी नहीं हैं? सिलसिलेवार घटनाओं से तो यही लग रहा है कि क़ानून का कोई खौफ ही नहीं, केस ही चलेगा ना? देख लेंगे वाली भावना काम कर रही है। ये नेटवर्क सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि इसके तार यूपी, मध्य प्रदेश बिहार और कई दूसरे राज्यों के शहरों तक फैले हुए हैं। समझ में नहीं आता कि फर्जीवाड़ा होता रहता है, जब लोग शिकायतें करते हैं तो सरकार सक्रिय होती है। एक दो पकड़ में आते हैं। इस तरह के गोरखधंधे में जो पकडे जाते हैं वो छोटी मुर्गियां हैं। ऑपरेट करने वाले सुरक्षित हैं। प्रशासन भी इन्हें प्रोटक्शन देता है, आगरा के मौत की मौकड्रिल करने वाले अस्पताल को जांच के बाद प्रशासन की क्लीन चिट मिलना इसी का नतीजा है। इसी वजह से कालाबाजार कुछ दिन के सन्नाटे के बाद फिर उठ खड़ा हो जाता है। हो सकता है ये बड़े स्तर की मिलीभगत हो जो आपदा में अवसर को बदलते हैं।
हकीकत में ऐसे मामले बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या जैसी कोशिश ही हैं, बल्कि हत्या क्यों कहा जाए इसे, ये तो सीधे-सीधे नरसंहार की कोशिश है। सरकार को इस मामले में अधिक गंभीर रुख दिखाना चाहिए और ऐसे अपराधियों को प्रोटक्शन देने वाले लोगों पर भी कड़ा रुख दिखाना चाहिए। हमारी व्यवस्थाओं की पोल तो कोविड ने खोल ही दी पर इंसानियत का जज्बा तो बचाकर रखना होगा।







