
शिशु के जन्म होने पर सबसे ज्यादा खुश कौन होता है? माता-पिता, रिश्तेदार ! किन्तु उस समय रोने का दायित्व नवजात शिशु का होता है। लेकिन जब हम इस दुनिया को छोड़ते हैं, तो इसका उल्टा होना चाहिए। अर्थात् लोग रोने चाहिए और हमारे मुख पर संतुष्टि की मुस्कान होनी चाइए। हमें जाते समय इस बात से खुश होना चाहिए कि हम इस दुनिया को कुछ देकर जा रहे हैं। दुनिया को रोना चाहिए, क्योंकि इसने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसने इस दुनिया की स्थिति को सुधारने में अमूल्य योगदान दिया था।
वस्तुत: हमारा काम दुनिया से लेना ही नहीं, कुछ देना भी है। इसलिए हमारी संस्कृति कहती है कि अच्छे लोग कभी नहीं मरते। उनके अच्छे कर्मों के कारण उनका नाम अमर है। दूसरी ओर, मृत्यु केवल दुर्जनों के लिए है। उनके जाने से पृथ्वी का भार कम हो जाता है। इसलिए जीवन इस तरह से जीना चाहिए कि लोग हमारे जाने के बाद हमें हमारे भले कर्मों से याद रखें। घृणा से नहीं!
कुछ साल पहले एक अखबार के ‘श्रद्धांजलि’ सेक्शन के में गलती से एक शख्स का नाम छप गया था। यह पढ़कर वह आदमी चौंक गया। लेकिन, थोड़ी देर बाद उसने पढ़ना शुरू किया। अखबार ने इसके बारे में लिखा था, ‘मौत का सौदागर मर गया।’ क्योंकि यह आदमी डायनामाइट का आविष्कारक था। यह पढ़कर उसने अपने आपसे पूछा, ‘क्या लोग मुझे इस तरह याद रखेंगे?’ उस दिन से उसकी जिंदगी में बदलाव आया। जीवन ऊर्ध्व दिशा में गति करने लगा। उसने दुनिया में शांति फैलाने का काम करना शुरू कर दिया। उस आदमी का नाम अल्फ्रेड नोबल था। आज उन्हें नोबेल पुरस्कार के जनक के रूप में याद किया जाता है।
इस प्रकार सच्ची और अमिट छाप छोड़ने के लिए कुछ प्रदान करना ही होता है। एक दार्शनिक कहते हैं, ‘आज तक किसी को इस बात का सम्मान नहीं मिला कि उसने दुनिया से क्या और कितना लिया। लेकिन मायने यह रखता है कि उन्होंने दुनिया को क्या और कितना दिया?’
इसीलिए एक कहावत में कहा गया है, “कर भला तो हो भला।” किन्तु संतों का जीवन तो उससे भी उत्तम, परम और प्रेरक होता है। वे केवल दूसरों का भला चाहते है, बदले में कोई आशा नहीं, अपनी भलाई की भी कामना उन्हें नहीं होती।
दरअसल प्रमुखस्वामी महाराज की तो यह जीवन भावना थी, ‘दूसरों का भला करना’, ‘दूसरों के लिए खुद सहन करना’। यह न केवल शाब्दिक था बल्कि उनके जीवन में भी प्रतिध्वनित होता था।
वे इस भावना को जीकर बता गए कि, ‘दूसरों की खुशी में हमारी खुशी है। हमारे आस पास रहते लोगों का दुःख और दर्द हमारा ही है। हमसे तो किसी को किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं होनी चाहिए। हर जीव में भगवान निवास करते हैं। जब आप उनकी सेवा करते हैं तो यह भगवान की सेवा है ऐसा मानकर उनकी सेवा कार्य में भी पूर्ण मनोयोग से संलग्न होना चाहिए।”
किसी को समय देना, किसी की पीड़ा समझना, किसी को आगे बढ़ने का अवसर देना, ये सब भी दान हैं। और कई बार यही दान सबसे मूल्यवान होते हैं। धन समाप्त हो सकता है, पर दिया हुआ प्रेम लौटकर बढ़ता रहता है।
एकबार एक लड़का नदी में डूब रहा था। आनन फानन में वह मदद के लिए चिल्लाया। किसी राहगीर ने उसे बचा लिया। जब वह आदमी जाने लगा तो उस लड़के ने कृतज्ञता से कहा, “धन्यवाद।” उस आदमी ने पूछा, “क्यों?” लड़के ने उत्तर दिया, “मेरी जान बचाने के लिए।” उस आदमी ने लड़के से कहा, यह तो मेरा कर्तव्य था।’
तो आइए हम भी अपना कर्तव्य मानकर दूसरों की खुशी में अपनी खुशी समझकर उनकी सेवा करें।

जब हम जाएँ, दुनिया रोए… और हम मुस्कुराएं: डॉ. ज्ञानानंद दास स्वामी">







