
11 अप्रैल 2026 की सुबह, नासा के आर्टेमिस II मिशन के चार बहादुर अंतरिक्ष यात्री धरती पर सुरक्षित लौट आए। उनका ओरियन कैप्सूल अमेरिका के सैन डिएगो तट के पास प्रशांत महासागर में ठीक 5:37 बजे (IST) स्प्लैशडाउन हुआ। यह मिशन 2 अप्रैल 2026 को लॉन्च हुआ था और लगभग 10 दिनों की ऐतिहासिक यात्रा के बाद पूरा हुआ।
यह 1972 के अपोलो 17 मिशन के बाद पहली बार था जब इंसान चंद्रमा के इतने करीब पहुंचा। आर्टेमिस II ने न केवल पुरानी उपलब्धियों को दोहराया, बल्कि कई नए रिकॉर्ड भी बनाए।
मिशन की मुख्य उपलब्धियां
मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री 6 अप्रैल को चंद्रमा के फार साइड (अंधेरे हिस्से) के पास से गुजरे। इस दौरान उन्होंने पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूरी तय की — करीब 2,52,756 मील (लगभग 4,06,778 किमी)। यह अपोलो-13 के रिकॉर्ड से करीब 4,100 मील ज्यादा था।
क्रू ने चंद्रमा की सतह की खूबसूरत तस्वीरें लीं और ओरियन स्पेसक्राफ्ट के लाइफ सपोर्ट सिस्टम, नेविगेशन, कम्युनिकेशन और थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम की विस्तृत जांच की। यह मिशन क्रूड नहीं था, यानी चंद्रमा पर लैंडिंग नहीं हुई, लेकिन यह भविष्य के मानव लैंडिंग मिशनों के लिए महत्वपूर्ण टेस्ट फ्लाइट साबित हुआ।
स्प्लैशडाउन की रोमांचक घड़ी (11 अप्रैल, सुबह)
ओरियन कैप्सूल की वापसी बेहद चुनौतीपूर्ण रही। वायुमंडल में प्रवेश के समय इसकी रफ्तार 40,000 से 42,000 किमी प्रति घंटा थी — जो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) से लौटने वाले यानों से कहीं ज्यादा है।
5:03 AM (IST): सर्विस मॉड्यूल से अलग होने के बाद हीट शील्ड सक्रिय हुई। घर्षण के कारण यान के बाहर का तापमान करीब 3,000 डिग्री फेरनहाइट (लगभग 1,650 डिग्री सेल्सियस) तक पहुंच गया। इस दौरान लगभग 6 मिनट का कम्युनिकेशन ब्लैकआउट रहा, क्योंकि यान के चारों ओर प्लाज्मा की परत बन गई थी।
5:23 AM: 22,000 फीट की ऊंचाई पर ड्रोग पैराशूट खुले। इनसे यान की रफ्तार कम हुई और वह स्थिर हुआ।
5:34 AM: 6,000 फीट की ऊंचाई पर छोटे पैराशूट अलग हुए और तीन मुख्य पैराशूट खुले। रफ्तार घटकर 218 किमी/घंटा से भी कम रह गई।
5:37 AM: अंत में रफ्तार सिर्फ 51 किमी प्रति घंटा रह गई और ओरियन कैप्सूल प्रशांत महासागर में सटीक स्प्लैशडाउन कर गया।
इस पूरी यात्रा में अंतरिक्ष यात्री कुल 11.17 लाख किमी (लगभग 695,000 मील) की दूरी तय करके लौटे। आर्टेमिस II क्रू- विविधता और अनुभव का अनोखा मिश्रण, इस मिशन में शामिल चार अंतरिक्ष यात्री थे:
कमांडर रीड वाइसमैन (Reid Wiseman) — नासा के अनुभवी एस्ट्रोनॉट, मिशन के कमांडर।
पायलट विक्टर ग्लोवर (Victor Glover) — नासा, पहले अफ्रीकी-अमेरिकी एस्ट्रोनॉट जो चंद्रमा के इतने करीब गए।
मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टीना कोच (Christina Koch) — नासा, पहले महिला एस्ट्रोनॉट जो इस मिशन का हिस्सा बनीं।
मिशन स्पेशलिस्ट जेरेमी हेंसन (Jeremy Hansen) — कनाडियन स्पेस एजेंसी, पहले गैर-अमेरिकी एस्ट्रोनॉट जो चंद्रमा के पास गए।
ये चारों 50 साल से ज्यादा समय बाद चंद्रमा की दहलीज पर पहुंचने वाले पहले इंसान बने। उन्होंने न केवल वैज्ञानिक परीक्षण किए, बल्कि अंतरिक्ष में इंसानी जीवन की सुरक्षा और स्थिरता को परखा।
अपोलो और आर्टेमिस प्रोग्राम में बड़ा अंतर
1970 के दशक के अपोलो मिशन मुख्य रूप से सोवियत संघ के साथ स्पेस रेस जीतने पर केंद्रित थे। उनका लक्ष्य चंद्रमा पर उतरना और वापस लौटना था।
दूसरी ओर, आर्टेमिस प्रोग्राम भविष्योन्मुखी है। नासा का लक्ष्य चंद्रमा पर एक स्थायी बेस (Artemis Base Camp) बनाना है, जहां इंसान लंबे समय तक रह सकें, काम कर सकें और संसाधनों का उपयोग कर सकें। यह बेस आगे चलकर मंगल ग्रह की यात्रा के लिए लॉन्चपैड का काम करेगा।
आर्टेमिस II ने ओरियन स्पेसक्राफ्ट और SLS रॉकेट की विश्वसनीयता साबित की, जो भविष्य के आर्टेमिस III (2028 में प्रस्तावित चंद्रमा लैंडिंग) के लिए जरूरी है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मिशन?
लाइफ सपोर्ट टेस्ट: अंतरिक्ष में लंबे समय तक इंसानों के रहने योग्य वातावरण की जांच।
रिकॉर्ड ब्रेकिंग: पृथ्वी से सबसे दूर जाने का नया रिकॉर्ड।
फार साइड फोटोग्राफी: चंद्रमा के अंधेरे हिस्से की दुर्लभ तस्वीरें।
भविष्य की तैयारी: 2028 में चंद्रमा पर मानव लैंडिंग और उसके बाद स्थायी बेस का रास्ता साफ।
वैज्ञानिक लाभ: चंद्रमा के संसाधनों (जैसे पानी के बर्फ) का अध्ययन, जो मंगल मिशन के लिए ईंधन और ऑक्सीजन बना सकते हैं।
नॉलेज सेक्शन: ऐतिहासिक संदर्भ
इस मिशन से पहले केवल 24 लोग ही चंद्रमा के पास या उसकी सतह तक पहुंच पाए थे। वे सभी अमेरिकी अपोलो मिशनों (1968-1972) के सदस्य थे। अपोलो प्रोग्राम में कुल 17 मिशन हुए, जिनमें 11 क्रूड थे।
आर्टेमिस II के साथ अब कुल 28 लोग चंद्रमा के करीब पहुंच चुके हैं। यह मिशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी प्रतीक है-अमेरिका और कनाडा के साथ भविष्य में यूरोप, जापान आदि देश भी शामिल होंगे।
आगे क्या?
आर्टेमिस II की इस सफलता के बाद नासा 2028 में आर्टेमिस III मिशन की तैयारी कर रहा है, जिसमें चंद्रमा की सतह पर इंसान उतरेगा। लक्ष्य है- चंद्रमा को “स्टेपिंग स्टोन” बनाना, ताकि मंगल और अन्य ग्रहों पर स्थायी उपस्थिति स्थापित की जा सके। यह मिशन सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि इंसानी जिज्ञासा और साहस का प्रतीक है। जब ओरियन कैप्सूल प्रशांत महासागर में उतरा, तो पूरी दुनिया ने तालियां बजाईं। 50 साल बाद फिर से चंद्रमा की ओर बढ़ते कदम ने साबित कर दिया कि इंसान कभी रुकता नहीं- वह हमेशा आगे बढ़ता है, नई सीमाओं को पार करता है।
आर्टेमिस II ने न केवल पुरानी यादें ताजा कीं, बल्कि भविष्य के सपनों को नई उड़ान दी। अब नजर 2028 की चंद्रमा लैंडिंग पर है, जहां इंसान फिर से चंद्रमा की मिट्टी को छुएगा और कहेगा- “हम वापस आ गए हैं, और इस बार हम यहीं रहने आए हैं।”





