
28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक वीडियो जारी कर युद्ध के स्पष्ट लक्ष्य बताए थे। उनका कहना था कि यह कार्रवाई अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा और ईरान से उत्पन्न खतरों को खत्म करने के लिए की गई है। अब सवाल यह है कि इन लक्ष्यों पर अमेरिका को कितनी सफलता मिली है और क्या अब भी अधूरा है।
1. मिसाइल ताकत को कमजोर करना
अमेरिका और इजराइल का पहला उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को कमजोर करना था। इसके तहत लॉन्चर, निर्माण इकाइयों, स्टोरेज साइट्स और कमांड सेंटर को निशाना बनाया गया। इन हमलों से ईरान को नुकसान जरूर हुआ है-कई ठिकाने तबाह हुए और उत्पादन की गति धीमी पड़ी।
फिर भी, ईरान की पूरी मिसाइल ताकत खत्म नहीं हुई है। उसकी कई मिसाइलें भूमिगत ठिकानों में सुरक्षित हैं और मोबाइल लॉन्चर के कारण वह अब भी हमले करने में सक्षम है। इसके अलावा, ईरान ने ड्रोन तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू कर दिया है, जिससे खतरा बना हुआ है।
2. नौसैनिक शक्ति पर प्रहार
दूसरा बड़ा लक्ष्य ईरान की नौसेना को कमजोर करना था। युद्धपोत, पनडुब्बियां और नौसैनिक ठिकानों पर हमले किए गए। मार्च की शुरुआत में एक अहम घटना में ईरानी वॉरशिप ‘IRIS डेना’ को डुबो दिया गया, जिससे उसकी लंबी दूरी की समुद्री क्षमता को बड़ा झटका लगा।
हालांकि, ईरान की नौसेना पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुई है। उसके पास छोटी तेज नावें और समुद्री माइंस जैसी रणनीतियां हैं, जिनसे वह खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे इलाकों में अब भी खतरा पैदा कर सकता है।
3. प्रॉक्सी मिलिशिया को निशाना
ईरान समर्थित मिलिशिया- जैसे लेबनान में सक्रिय हिजबुल्लाह- को कमजोर करना भी अहम लक्ष्य था। इजराइल ने इनके ठिकानों पर कई हमले किए, जिसमें कई कमांडर मारे गए। इसके बावजूद ये नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। इराक, सीरिया, यमन और लेबनान में फैले इन समूहों की जड़ें गहरी हैं और इन्हें स्थानीय समर्थन भी मिलता है। यही वजह है कि ये अब भी हमले करने में सक्षम हैं।
4. परमाणु कार्यक्रम पर रोक
अमेरिका का सबसे संवेदनशील लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था। कई परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिससे कार्यक्रम को नुकसान पहुंचा। लेकिन पूरी सफलता अभी नहीं मिली है। समृद्ध यूरेनियम के भंडार अब भी मौजूद बताए जाते हैं, जो गहरे भूमिगत ठिकानों में छिपे हो सकते हैं। इन्हें खत्म करना हवाई हमलों से कठिन है और जमीनी कार्रवाई का जोखिम बहुत अधिक है।
5. सत्ता परिवर्तन की कोशिश
ट्रम्प ने ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात भी कही थी और जनता से सरकार के खिलाफ उठने की अपील की थी। हालांकि, जमीनी स्तर पर ऐसा कोई बड़ा जन आंदोलन देखने को नहीं मिला। भले ही शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हुआ हो, लेकिन शासन प्रणाली में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है। नया नेतृत्व भी पहले की तरह सख्त रुख अपनाए हुए है और अमेरिका के प्रति उसका नजरिया नहीं बदला है।







