
मध्य पूर्व में जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच तनावपूर्ण संघर्ष अब 29वें दिन में प्रवेश कर चुका है। इस युद्ध ने न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। लगातार हो रहे हमलों, विशेषकर ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार और तेल आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका गहराती जा रही है। ऐसे में दुनिया के बड़े देश और नेता इस संकट को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने के प्रयास में जुटे हुए हैं।
इसी कड़ी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से फोन पर बातचीत की। इस वार्ता में दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग खुले और सुरक्षित बने रहने चाहिए, ताकि वैश्विक व्यापार प्रभावित न हो। यह मार्ग दुनिया के तेल परिवहन के लिए बेहद अहम माना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने ऊर्जा ठिकानों पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए क्षेत्र में शांति और स्थिरता की आवश्यकता पर बल दिया।
दूसरी ओर, इस युद्ध के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल भी सामने आई है। तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब के विदेश मंत्री 30 मार्च को पाकिस्तान पहुंचने वाले हैं, जहां वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से मुलाकात करेंगे। इस्लामाबाद में आयोजित होने वाली इस बैठक में मध्य पूर्व के मौजूदा हालात और संभावित समाधान पर चर्चा की जाएगी। युद्ध शुरू होने के बाद यह पहली बड़ी बहुपक्षीय बैठक मानी जा रही है, जिसमें कई देशों के शीर्ष राजनयिक एक साथ शामिल होंगे।
इस बैठक के लिए पाकिस्तान को चुना जाना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान के ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ संतुलित और बेहतर संबंध हैं। साथ ही, वह इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा नहीं हुआ है, जिससे उसे एक तटस्थ मंच के रूप में देखा जा रहा है। तुर्किये और मिस्र जैसे देशों के साथ भी उसके संबंध सामान्य और सहयोगात्मक हैं, जो इस बैठक को सफल बनाने में मददगार हो सकते हैं। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात यह संकेत देते हैं कि जहां एक ओर युद्ध की तीव्रता चिंता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक प्रयास भी तेज हो रहे हैं।







