
राजधानी दिल्ली स्थित विश्वप्रसिद्ध स्वामिनारायण अक्षरधाम परिसर में आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन सम्पन्न हुआ। नीलकंठ वर्णी की 108 फीट ऊँची भव्य प्रतिमा का प्रतिष्ठा महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, वैदिक परंपराओं और भव्यता के साथ आयोजित किया गया। यह प्रतिमा भगवान स्वामिनारायण के बाल तपस्वी स्वरूप का सजीव प्रतीक है, जो त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक जागृति का संदेश देती है।
यह विशाल प्रतिमा नीलकंठ वर्णी को एक चरण पर खड़े गहन ध्यानमग्न मुद्रा में दर्शाती है। बाल्यावस्था में ही चार माह तक निर्जल और निराहार रहकर पुलहाश्रम में किए गए उनके तप का यह अद्भुत रूपांकन है। मात्र 11 वर्ष की आयु में आरंभ हुई उनकी सात वर्ष लंबी भारत यात्रा, जिसे कल्याण यात्रा के रूप में जाना जाता है, आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती है। यह प्रतिमा उसी तप, त्याग और आध्यात्मिक साधना का सजीव प्रतीक बनकर उभरी है।
इस भव्य आयोजन का संचालन परम पूज्य महंतस्वामी महाराज के पावन सान्निध्य और मार्गदर्शन में हुआ। देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं और लगभग 300 संतों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी दिव्य बना दिया। प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ अक्षरधाम परिसर में उमड़ पड़ी थी। पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु भजन, मंत्रोच्चार और प्रार्थनाओं में लीन दिखाई दिए, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
प्रातः 6 बजे से प्रारंभ हुए प्रतिष्ठा अनुष्ठान वैदिक विधियों के अनुसार अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता के साथ सम्पन्न हुए। धूप, पुष्प और मंत्रों की सुगंधित वाणी से परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। श्रद्धालु भावविभोर होकर इस दिव्य क्षण के साक्षी बने।
इस दो दिवसीय महोत्सव में 25 मार्च को विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर शांति और सद्भावना के प्रतीक स्वरूप श्वेत कबूतरों को आकाश में उड़ाया गया तथा विश्व में शांति की कामना की गई। 26 मार्च को मुख्य प्रतिष्ठा समारोह सम्पन्न हुआ, जिसमें महंतस्वामी महाराज ने वैदिक विधियों से प्रतिमा की प्रतिष्ठा की।
अपने आशीर्वचनों में महंतस्वामी महाराज ने इस प्रतिमा को “अत्यंत सुंदर” बताते हुए कहा कि यह सम्पूर्ण विश्व में शांति का संदेश फैलाएगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यहाँ आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को सद्गुणों की प्रेरणा मिलेगी और उसका आध्यात्मिक कल्याण होगा।
इस आयोजन की सफलता में संतों, स्वयंसेवकों और श्रद्धालुओं का विशेष योगदान रहा। विशाल जनसमूह के सुव्यवस्थित प्रबंधन से लेकर अनुष्ठानों और आतिथ्य व्यवस्था तक, हजारों सेवकों ने निःस्वार्थ भाव से सेवा दी।
नीलकंठ वर्णी की इस भव्य प्रतिमा की स्थापना के साथ अक्षरधाम ने एक वैश्विक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत किया है। यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को भक्ति, अनुशासन, त्याग और उच्च जीवन मूल्यों की प्रेरणा देती रहेगी।








