
मानव जीवन की राहों पर सबसे बड़ा शत्रु कोई बाहरी बाधा नहीं, बल्कि वह हमारे भीतर बैठा हुआ है। यही आंतरिक स्वभाव जो आलस्य की ज़मीन पर उत्पन्न होकर मन को अपने क़ब्ज़े में लेकर हर कार्य को रोक देता है। फलस्वरूप मानवीय उत्थान की चिंगारी ही बूझने लगती है।
किंतु याद रहें, जीवन कोई शांत सरोवर नहीं है, जहाँ बिना प्रयास के कमल खिल उठते हों। यह तो एक प्रचंड प्रवाहमान नदी है, जो चट्टानों से टकराती है, बाधाओं से जूझती है और अंततः अपना मार्ग स्वयं बना लेती है। जो व्यक्ति इस प्रवाह में उतरने से डरता है, वह किनारे की रेत पर ही बैठा रह जाता है। उसकी आँखों में सपनों का आकाश तो होता है, पर उसके पाँवों में चलने का साहस नहीं होता। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर के भय और जड़ता को तोड़ दें और संकल्प की मशाल लेकर आगे बढ़ें।
आज का युग कर्म का युग है। यहाँ वही जीवित है, जो चल रहा है; वही विजयी है, जो संघर्ष कर रहा है। जो व्यक्ति बाधाओं के सामने रुक जाता है, वह अपने ही हाथों अपनी संभावनाओं का गला घोंट देता है। पर्वत की ऊँचाई देखकर यदि पथिक बैठ जाए, तो वह शिखर तक कैसे पहुँचेगा? मार्ग में काँटे हैं, अंधकार है, तूफ़ान है, परंतु इन्हीं के बीच से गुजरकर ही मंज़िल की उज्ज्वल प्रभा दिखाई देती है।
आलस्य मनुष्य की चेतना पर पड़ा हुआ वह जंग है, जो धीरे-धीरे उसकी प्रतिभा को क्षीण कर देता है। यह कहता है, “अभी नहीं, कल करेंगे।” परंतु इतिहास गवाह है कि जो कार्य “कल” पर टाल दिए जाते हैं, वे अक्सर कभी पूर्ण नहीं होते। जीवन का प्रत्येक क्षण एक अमूल्य अवसर है। जो उसे पकड़ लेता है, वही इतिहास के पृष्ठों पर अपनी अमिट छाप छोड़ता है।
जब अंधकार चारों ओर फैल जाता है, तब एक छोटी-सी मशाल भी दिशा दिखा देती है। उसी प्रकार, जब मनुष्य अपने भीतर संकल्प की ज्योति जला लेता है, तो बाधाएँ भी उसके सामने तुच्छ प्रतीत होने लगती हैं। यह मशाल केवल प्रकाश नहीं देती; यह साहस भी देती है, ऊर्जा भी देती है और आगे बढ़ने का अदम्य विश्वास भी जगाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर सोई हुई शक्ति को जगाएँ। अपने मन की शंकाओं को त्याग दें, अपने कदमों की झिझक को दूर कर दें। जो मार्ग हमें कठिन लगता है, वही हमारे व्यक्तित्व को महान बनाता है। यदि हम ठहर गए, तो समय हमें पीछे छोड़ देगा; यदि हम आगे बढ़े, तो समय भी हमारे साथ चलने लगेगा।
क्योंकि यह आलस्य मनुष्य की शक्ति को जकड़ लेता है, उसकी चेतना पर धुंध-सा छा जाता है और उसकी प्रगति की संभावनाओं को अंधकार में ढकेल देता है। इसलिए उठो, जागो और अपने जीवन-पथ पर प्रगति और प्रतीति की मशाल जला दो। समय की यही पुकार है, अपने भीतर छिपी हुई उस अग्नि को प्रज्वलित करो, जो संकल्प की ज्वाला बनकर जीवन-पथ को आलोकित कर दे।
आलस्य के अंधकार को चीर दो, बाधाओं की दीवारों को लांघ दो और कर्म की उज्ज्वल दिशा में निर्भीक होकर बढ़ चलो।
याद रखो, इतिहास उन्हीं के चरणों में अपना मस्तक झुकाता है, जिन्होंने अंधकार से लड़ने का साहस किया और अपने हाथों में मशाल लेकर मार्ग को प्रकाशमय बना दिया। महंत स्वामी महाराज यही कहते हैं, “रुको मत, थको मत, झुको मत। यदि भीतर प्रभुश्रद्धा की ज्वाला जल रही है, तो कोई भी बाधा तुम्हारे पथ को रोक नहीं सकती। बस एक बार अपने भीतर की उस मशाल को प्रज्वलित कर दो, फिर देखो, अंधकार स्वयं पीछे हट जाएगा और तुम्हारे कदमों के आगे उजाले का एक नया क्षितिज खुल जाएगा।”

अब तो मशाल जला दो- डॉ ज्ञानानंद दास स्वामी">








