
नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने जनवरी 2026 में Equity in Higher Education Institutions Regulations जारी किए थे, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को खत्म करना और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना था। हालांकि, नए नियमों को लेकर विवाद शुरू हो गया। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए इन नियमों पर अस्थायी रोक लगा दी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या की पीठ ने कहा कि नियमों में अस्पष्टता है, जो गलत उपयोग की संभावना पैदा कर सकती है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से निर्देश दिया कि नियमों का मसौदा फिर से तैयार किया जाए। फिलहाल 2012 के पुराने ढांचे के तहत व्यवस्थाएं लागू रहेंगी।
UGC भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक वैधानिक संस्था है। यह शिक्षा की दिशा तय करने, विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और योग्य संस्थानों को वित्तीय सहायता देने का काम करती है। 1956 में संसद द्वारा पारित यूजीसी अधिनियम से इसे वैधानिक दर्जा मिला, लेकिन इसकी नींव 1945 में University Grants Committee के रूप में रखी गई थी।
ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा व्यवस्था अलग थी। विश्वविद्यालयों की स्थापना कानूनी अधिनियमों और प्रांतीय नीतियों के तहत होती थी, लेकिन मानकीकृत निगरानी का अभाव था। 1823 में माउंटस्टुअर्ट एल्फिंस्टन, 1835 में लॉर्ड मैकाले और 1854 में सर चार्ल्स वुड ने शिक्षा सुधारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1925 में इंटर-यूनिवर्सिटी बोर्ड का गठन हुआ, लेकिन इसे विश्वविद्यालयों को मान्यता देने का अधिकार नहीं था।
1945 में University Grants Committee बनी, जिसने शुरुआत में तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों—अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी—की निगरानी की। 1947 के बाद इसका दायरा पूरे देश के विश्वविद्यालयों तक बढ़ा। स्वतंत्र भारत में 1948 में डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग बनाई गई, और 1956 में यूजीसी अधिनियम पारित होने के बाद यह देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक स्थायी संस्था बन गई।









