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क्या अब नहीं रहा सबका साथ, सबका विकास ?- Article 14 के आईने में मौजूदा हालात

क्या अब नहीं रहा सबका साथ, सबका विकास ?
क्या अब नहीं रहा सबका साथ, सबका विकास ?
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Written by
Rishabh Rai

सबका साथ, सबका विकास केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि यह उस संवैधानिक भावना का विस्तार था, जो अनुच्छेद 14 में निहित है- कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार। लेकिन हाल के घटनाक्रमों और नीतिगत फैसलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह भावना ज़मीन पर उतनी ही मज़बूती से मौजूद है, जितनी भाषणों में दिखाई देती है?

Article 14 का अर्थ केवल यह नहीं है कि सभी नागरिक समान हैं, बल्कि यह भी है कि राज्य किसी के साथ मनमाना या भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता। समान परिस्थितियों में समान व्यवहार और असमान परिस्थितियों में तर्कसंगत वर्गीकरण- यही इसकी कसौटी है। जब किसी नीति, नियम या प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर यह धारणा बनती है कि कुछ वर्गों को सुना जा रहा है और कुछ को अनदेखा, तो Article 14 के उल्लंघन की बहस स्वाभाविक हो जाती है।

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UGC के नए नियमों से लेकर प्रशासनिक कार्रवाइयों, निलंबनों और असहमति पर सख्ती तक- आलोचकों का कहना है कि निर्णयों में संवाद की कमी और एकतरफा दृष्टिकोण दिखता है। अगर फैसले बिना व्यापक परामर्श के लिए जाएं, और प्रभावित वर्गों की आशंकाओं को ‘राजनीतिक शोर’ कहकर खारिज कर दिया जाए, तो ‘सबका साथ’ का दावा कमजोर पड़ता है।

सरकार का पक्ष यह है कि कोई भेदभाव नहीं हो रहा, सभी नियम संविधान के दायरे में हैं और उद्देश्य केवल सुधार व सुशासन है। यह तर्क अपने स्थान पर है। लेकिन लोकतंत्र में केवल इरादा सही होना पर्याप्त नहीं, बल्कि प्रक्रिया का निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी होता है। जब समानता का अधिकार सिर्फ कागज़ पर सुरक्षित दिखे, लेकिन व्यवहार में चयनात्मक सख्ती या सहूलियत नज़र आए, तो भरोसा डगमगाता है।

‘सबका विकास’ का अर्थ सिर्फ आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सम्मान, प्रतिनिधित्व और सुने जाने का अधिकार भी है। अगर कुछ समूह यह महसूस करने लगें कि वे फैसलों के केंद्र में नहीं, बल्कि हाशिए पर हैं, तो यह नारा खोखला प्रतीत होने लगता है।

निष्कर्ष यही है कि Article 14 आज भी संविधान में पूरी मजबूती से मौजूद है, लेकिन उसकी आत्मा को जीवित रखना सत्ता की निरंतर जिम्मेदारी है। सरकार के लिए यह आत्ममंथन का समय है- क्या नीतियां सिर्फ लागू हो रही हैं, या स्वीकार भी की जा रही हैं? क्योंकि लोकतंत्र में वैधता केवल बहुमत से नहीं, न्याय और समानता की अनुभूति से आती है।

 

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