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आखिर क्यों UGC के नए नियम विवादों में हैं?

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Written by
Rishabh Rai

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर देशभर में जो असंतोष उभरकर सामने आया है, वह सिर्फ एक नीतिगत मतभेद नहीं है. यह विवाद उच्च शिक्षा की दिशा, सामाजिक न्याय और संघीय ढांचे से जुड़े गहरे सवालों को छूता है. सरकार जहां इसे शिक्षा सुधार की ज़रूरी कड़ी बता रही है, वहीं विरोध करने वाले इसे अधिकारों और प्रतिनिधित्व पर हमला मान रहे हैं.

विवाद की पहली और सबसे बड़ी वजह है केंद्रीकरण का डर. नए नियमों के तहत नियुक्तियों, योग्यता मानकों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में UGC की भूमिका पहले से ज्यादा मजबूत हो जाती है. राज्यों और विश्वविद्यालयों को आशंका है कि इससे उनकी स्वायत्तता सीमित होगी और शिक्षा का संचालन पूरी तरह दिल्ली-केंद्रित हो जाएगा. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह चिंता स्वाभाविक है, जहां शिक्षा का ढांचा लंबे समय से केंद्र और राज्यों के साझा दायरे में रहा है.

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दूसरा अहम मुद्दा है सामाजिक न्याय और आरक्षण. विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों की भाषा भले ही तटस्थ हो, लेकिन व्यवहार में इसका असर वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है. विशेषकर नियुक्तियों और प्रमोशन से जुड़े प्रावधानों को लेकर आशंका है कि आरक्षण व्यवस्था कमजोर हो सकती है. यही वजह है कि छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने इसे सामाजिक संतुलन के खिलाफ कदम बताया है.

तीसरी वजह है परामर्श की कमी. शिक्षा नीति जैसे संवेदनशील विषय पर व्यापक संवाद की उम्मीद की जाती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि नए नियम बिना पर्याप्त सलाह-मशविरे के लागू किए गए. जब शिक्षक, विश्वविद्यालय और राज्य सरकारें खुद को फैसले की प्रक्रिया से बाहर पाते हैं, तो विरोध स्वाभाविक हो जाता है.

सरकार का तर्क है कि ये नियम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, वैश्विक मानकों के अनुरूप भारतीय विश्वविद्यालयों को प्रतिस्पर्धी बनाने और योग्यता-आधारित व्यवस्था मजबूत करने के लिए जरूरी हैं. सरकार यह भी दोहरा रही है कि किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होगा और आरक्षण व्यवस्था पूरी तरह लागू रहेगी.

लेकिन सवाल यह है कि अगर नियम इतने ही निष्पक्ष हैं, तो इतना व्यापक असंतोष क्यों? असल में यह टकराव गुणवत्ता बनाम समावेशन, केंद्रीकरण बनाम संघवाद और तेजी से सुधार बनाम सामाजिक सहमति के बीच का है. शिक्षा केवल डिग्री देने का तंत्र नहीं, बल्कि समाज गढ़ने का माध्यम है.

इसलिए जरूरत इस बात की है कि सरकार विरोध को महज राजनीतिक शोर न माने, बल्कि आशंकाओं को गंभीरता से सुने. पारदर्शिता, संवाद और भरोसा ही इस विवाद का समाधान निकाल सकते हैं. वरना UGC के ये नियम सुधार से ज्यादा टकराव की पहचान बनकर रह जाएंगे.

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