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भारत–यूरोपीय यूनियन फ्री ट्रेड डील: फायदे किसे, झटका किसे?

भारत–EU के बीच ट्रेड डील
भारत–EU के बीच ट्रेड डील
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Written by
Rishabh Rai

लंबे इंतज़ार के बाद भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच फ्री ट्रेड डील का फाइनल होना वैश्विक व्यापार की राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है. इस डील को दोनों पक्ष ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कह रहे हैं, लेकिन असली सवाल यही है कि इससे सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा- भारत को या यूरोपीय यूनियन को? और दिलचस्प बात यह है कि इस डील से सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका और खास तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को होता दिख रहा है.

भारत के लिए यह डील इसलिए अहम है क्योंकि यूरोपीय यूनियन कोई एक देश नहीं, बल्कि 27 देशों का समूह है. यानी भारत को एक साथ 27 देशों का बड़ा और समृद्ध बाजार मिल रहा है. अभी भारत-EU का कुल व्यापार 190 बिलियन डॉलर से अधिक है, जिसमें भारत पहले से ही ट्रेड सरप्लस में है. डील लागू होने के बाद भारत के करीब 99 फीसदी उत्पादों को यूरोप में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा. कपड़ा, चमड़ा, ज्वेलरी, फुटवियर, दवाएं, स्मार्टफोन और इंजीनियरिंग सामान यूरोपीय बाजार में सस्ते होंगे, जिससे भारत के निर्यात में तेज़ बढ़ोतरी तय मानी जा रही है. इसके अलावा सर्विस सेक्टर में भी भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए यूरोप में काम करना आसान होगा, जिससे रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.

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वहीं यूरोपीय यूनियन के लिए इस डील का सबसे बड़ा फायदा भारत जैसा विशाल उपभोक्ता बाजार है. करीब 140 करोड़ की आबादी वाला भारत यूरोपीय कंपनियों के लिए सुनहरा मौका है. लग्जरी कारों पर टैरिफ 110 फीसदी से घटकर 10 फीसदी होने से BMW, Mercedes और Volkswagen जैसी कंपनियों को बड़ा लाभ मिलेगा. प्रीमियम शराब पर टैक्स में कटौती से यूरोपीय वाइन और व्हिस्की का बाजार भी तेजी से बढ़ेगा. इसके साथ ही मशीनरी, केमिकल्स और मेडिकल इक्विपमेंट्स के निर्यात से यूरोप की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को बल मिलेगा. यूरोपीय यूनियन का दावा है कि 2032 तक भारत में उसका एक्सपोर्ट दोगुना होगा और करीब 8 लाख नई नौकरियां पैदा होंगी.

इस पूरी तस्वीर में सबसे बड़ा झटका अमेरिका को लगता दिख रहा है. डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने भारत और यूरोप दोनों को वैकल्पिक बाजार खोजने के लिए मजबूर किया, और यही डील उसका नतीजा है. भारत और EU मिलकर दुनिया की करीब 25 फीसदी GDP और 30 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में यह डील साफ संकेत देती है कि वैश्विक व्यापार अब अमेरिका-केंद्रित नहीं रहा.

हालांकि यह भी सच है कि डील के पूरी तरह लागू होने में अभी समय लगेगा. असली असर तभी दिखेगा जब समझौते ज़मीन पर उतरेंगे. फिलहाल इतना तय है कि इस डील ने वैश्विक व्यापार की दिशा बदलने का संकेत दे दिया है.

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