
दिसंबर महीने में आम आदमी को महंगाई के मोर्चे पर झटका लगा है। सब्जियों और दालों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के चलते थोक महंगाई दर (WPI – Wholesale Price Index) बढ़कर 1.33% पर पहुंच गई, जो पिछले तीन महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। नवंबर में यह दर महज 0.71% थी। यानी एक महीने में महंगाई लगभग दोगुनी हो गई।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर में खाद्य वस्तुओं की महंगाई में सबसे ज्यादा इजाफा देखने को मिला। खासतौर पर सब्जियों और दालों के दाम तेजी से बढ़े, जिससे कुल थोक महंगाई पर सीधा असर पड़ा। सब्जियों की कीमतों में मौसमी कारणों और आपूर्ति में बाधा के चलते उछाल देखा गया, जबकि दालों की कीमतों में भी लगातार मजबूती बनी रही।
खाद्य महंगाई के अलावा, कुछ हद तक मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों और ईंधन से जुड़ी वस्तुओं की कीमतों ने भी महंगाई बढ़ाने में योगदान दिया। हालांकि ईंधन एवं पावर सेक्टर में कीमतों का असर सीमित रहा, लेकिन खाने-पीने की चीजों की महंगाई ने समग्र आंकड़ों को ऊपर खींच लिया।
सर्दियों के मौसम में कुछ सब्जियों की आवक कम होने और परिवहन लागत बढ़ने से कीमतों पर दबाव बना। इसके अलावा, दालों के उत्पादन और स्टॉक को लेकर चिंताओं ने भी बाजार में कीमतें ऊंची बनाए रखीं। इसका असर सीधे तौर पर थोक बाजारों के साथ-साथ खुदरा स्तर पर भी देखने को मिल रहा है।
महंगाई के इस बढ़ते आंकड़े से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की चिंता भी बढ़ सकती है। हालांकि फिलहाल थोक महंगाई नियंत्रण में मानी जा रही है, लेकिन अगर खाद्य वस्तुओं के दाम इसी तरह बढ़ते रहे, तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई (CPI) पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में ब्याज दरों को लेकर आरबीआई की नीति पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि अगर आने वाले महीनों में नई फसल की आवक बेहतर रहती है और सप्लाई चेन सामान्य होती है, तो सब्जियों और दालों के दामों में कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन फिलहाल दिसंबर के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि महंगाई का दबाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।








