
इंदौर के हालात भयावह हैं। दूषित पानी ने लोगों की जानें छीन ली हैं, और हर रोज़ मौतों की खबरें सामने आती हैं। लेकिन इस गंभीर समस्या पर जब जिम्मेदार बोलते हैं, तो लगता है कि वे असमंजस और आंकड़ों के पीछे छिपकर अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। हाँ, हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की, जिनका हालिया बयान जनता के गुस्से और सवालों के बीच वायरल हुआ।
मंत्री जी ने कहा कि ‘सरकारी आंकड़े अलग हैं, और स्थानीय स्थिति अलग।‘ सवाल यह है- कैलाश जी, आम आदमी के लिए ये आंकड़े कितने मायने रखते हैं? जब किसी का परिवार दूषित पानी पीकर बीमार पड़ता है या मर जाता है, तब क्या उसे आपका असमंजस समझ आता है? क्या यह जनता की पीड़ा को नजरअंदाज करने की कोशिश नहीं है?
हैरानी की बात यह भी है कि मंत्री जी खुद क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। उन्होंने देखा कि असली स्थिति क्या है, फिर भी उनका बयान सिर्फ़ यही दिखाता है कि वे जिम्मेदारी लेने के बजाय बहाने ढूंढ रहे हैं। चार मौतें हुई, आठ हुई, या ज्यादा- संख्या कितनी भी हो, सवाल वही है: क्यों रोक नहीं पाए इस त्रासदी को?
ग्रामीण और शहरी जनता पूछ रहे हैं: क्या मृतकों की संख्या छुपाई जा रही है? क्या सरकारी मशीनरी के दबाव में मंत्री जी ने संख्या और रिपोर्ट की राजनीति में वास्तविक कार्रवाई को पीछे छोड़ दिया है? जनता की सुरक्षा सिर्फ आंकड़ों में नहीं आती, कैलाश जी, यह तुरंत और ठोस कार्रवाई से आती है।
असली सवाल यह है कि मंत्री जी की प्राथमिकता क्या है- जनता की जान बचाना या राजनीतिक सुरक्षा? क्या इंदौर के लोग सिर्फ आपकी प्रेस नोट्स और बयान सुनने आए हैं? क्या आपका असमंजस और चुप्पी ही जनता को राहत देगा? हर मौत के पीछे सवाल यही है: कैलाश विजयवर्गीय कहाँ हैं, और कब तक बचाव की राजनीति करेंगे?
हमारा सवाल साफ है- आपके मंत्रालय ने समय रहते क्या कदम उठाए? क्या दोषियों और लापरवाहों को तुरंत पकड़ा गया? या फिर यह सब सिर्फ़ मृतकों के आंकड़ों के पीछे खेल है? इंदौर की जनता को जवाब चाहिए, बहाने नहीं।







