
नई दिल्ली: भारतीय रुपया विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार दबाव में है और मंगलवार को यह 90.05 प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर तक गिर गया, जो इसे ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचाता है। रुपया लगातार गिरावट की प्रवृत्ति में है और विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें कई कारक शामिल हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की भारत से पैसा निकालना और डॉलर की मजबूती है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने पिछले कुछ हफ्तों में भारी निकासी की है। केवल अक्टूबर में ही बाजार से लगभग 1.5 अरब डॉलर निकाले गए। इस वजह से स्टॉक और बॉन्ड बाजार पर दबाव बढ़ा है और रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। निवेशकों का मानना है कि बढ़ती वैश्विक ब्याज दरें और अमेरिका में आर्थिक अनिश्चितता की स्थिति भारतीय बाजारों को जोखिम भरा बना रही है।विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर में मजबूती ने भी रुपया गिरने में अहम भूमिका निभाई है। डॉलर की तुलना में अन्य मुद्राओं की कीमतें कमजोर होने के कारण रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में दबाव में रहा। इसके अलावा, घरेलू व्यापार घाटा और तेल की बढ़ती कीमतें भी मुद्रा पर दबाव डाल रही हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अब तक इस गिरावट को रोकने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग किया है, लेकिन व्यापक वैश्विक परिस्थितियों के कारण यह प्रभाव सीमित रहा है। बैंक के सूत्रों का कहना है कि रिज़र्व बैंक बाजार में स्थिरता लाने के लिए सतत निगरानी रखे हुए है और आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। वहीं घरेलू निवेशकों को वर्तमान स्थिति में सतर्क रहना चाहिए और विदेशी मुद्रा में निवेश करते समय जोखिम का ध्यान रखना चाहिए। रुपये की यह कमजोरी आयातित वस्तुओं और ईंधन की कीमतों को बढ़ा सकती है, जिससे आम उपभोक्ता पर भी असर पड़ेगा। अन्य एशियाई मुद्राओं की तुलना में भारतीय रुपया कमजोर दिख रहा है। मार्केट विश्लेषकों का कहना है कि अगर विदेशी निवेशकों की निकासी इसी तरह जारी रही और डॉलर की मजबूती बनी रही, तो रुपया और गिर सकता है और 91 के स्तर की ओर बढ़ सकता है।








