
लेखक:- ऋषभ राय, अवध सूत्र
“जब सड़क खामोश है, सदन आवारा होती है…”
डॉ. राम मनोहर लोहिया की यह बात अब एक गूंज बनकर संसद के गलियारों से सड़कों तक फैल रही है। और यह गूंज तब और तेज हो गई जब पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुदर्शन रेड्डी ने इसे दोहराया — नारे की तरह नहीं, बल्कि चेतावनी की तरह।
भारत के नए उपराष्ट्रपति पद के लिए विपक्षी INDIA गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में नामांकन करने जा रहे सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी कई मायनों में अहम है। न सिर्फ इसलिए कि वे एक पूर्व न्यायाधीश हैं, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने जिस मंच से यह जिम्मेदारी स्वीकार की है, वह अब संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण की लड़ाई का मंच बन चुका है।
न्यायपालिका से संसद तक: एक सफर, एक चुनौती
सुदर्शन रेड्डी ने खुद कहा — “उपराष्ट्रपति का पद राजनीतिक नहीं, संवैधानिक है।”
यह वाक्य जितना सरल है, उतना ही गहरा भी। जब एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज लोकतांत्रिक संस्थाओं के मौन पर चिंता जताते हुए खुद मैदान में उतरता है, तो यह केवल चुनाव नहीं, एक संवैधानिक प्रतिरोध की शुरुआत बन जाता है।
उनकी उम्मीदवारी, उनके बयान, और उनका रवैया — ये सब एक गहरी बेचैनी से जन्मे हैं। वह बेचैनी, जिसे आज भारत का आम नागरिक, पत्रकार, शिक्षक, किसान, युवा — सब महसूस कर रहे हैं, लेकिन कोई संस्थान बोल नहीं रहा।
बिहार में SIR और चुनाव आयोग की चुप्पी
रेड्डी ने बिहार की SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह वही प्रक्रिया है जिसके जरिए मतदाता सूची से लाखों लोगों के नाम हटाए जाने की आशंका उठी है — और चुनाव आयोग अब तक साफ जवाब नहीं दे पाया है।
उन्होंने ठीक कहा — “लोकतंत्र में आम आदमी के पास केवल एक हथियार होता है — उसका वोट। और जब वो भी छीना जाने लगे, तो लोकतंत्र में क्या बचेगा?”
चुनाव आयोग की चुप्पी सिर्फ विफलता नहीं, संवैधानिक निष्ठा से गिरावट का संकेत बनती जा रही है। आयोग आजकल सत्ता के हितों की निगरानी तो करता है, लेकिन आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए बोलना भूल गया है।
राहुल गांधी की सक्रियता का असर
रेड्डी ने राहुल गांधी की खुले तौर पर तारीफ की — और यह तारीफ सिर्फ राजनीतिक नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिक भागीदारी की जीत है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने “सड़क को खामोश नहीं रहने दिया” और सरकारों को जाति जनगणना जैसी लोक-हितैषी पहल के लिए बाध्य किया।
यह उस नेता की मान्यता है जो सड़क से नहीं, अदालत से आया है। अगर एक पूर्व जज कहे कि राहुल गांधी लोकतंत्र को जिन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं, तो सत्ता को नहीं, संविधान को सुनने की ज़रूरत है।
उपराष्ट्रपति चुनाव से परे — असली लड़ाई
आने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव का नतीजा लगभग तय माना जा रहा है, क्योंकि संख्या बल NDA के पक्ष में है। लेकिन यह चुनाव एक वैचारिक लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।
सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा।
सवाल यह है कि क्या संवैधानिक संस्थाएं, खासकर चुनाव आयोग, संसद और न्यायपालिका — अपनी भूमिका निभाएंगी या सत्ता की गोद में चुपचाप बैठी रहेंगी?
लोकतंत्र की असली परीक्षा
जब एक पूर्व न्यायाधीश राजनीति में प्रवेश करता है, तो यह राजनीति का विस्तार नहीं, संविधान की रक्षा की कोशिश होती है।
जब सड़कें खामोश नहीं होतीं, तो संसदें मजबूर होती हैं जवाब देने को।
और जब विपक्ष एक न्यायविद को आगे करता है, तो वह सिर्फ सत्ता के खिलाफ खड़ा नहीं होता — बल्कि वह सिस्टम को आईना दिखाता है।
अब जिम्मेदारी मतदाता की भी है, और आयोग की भी।
अगर हम चुप रहे, तो अगली बार न सड़क बोलेगी, न संसद।
“जब सड़क खामोश होती है, सदन आवारा हो जाती है।” लेकिन आज, सड़कें जाग रही हैं — और शायद, यही लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद है।









