
ग्रेटर नोएडा स्थित शारदा यूनिवर्सिटी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। बिहार के पूर्णिया जिले के एक छात्र ने, जो 2022 में इस यूनिवर्सिटी में दाख़िल हुआ था, आत्महत्या कर ली।
जानकारी के मुताबिक छात्र पहले ही सेमेस्टर में असफल हो गया था। इसके बाद 2023 से उसने कभी भी क्लास अटेंड नहीं की। हैरानी की बात यह है कि लगातार हर सेमेस्टर की भारी-भरकम फीस उसके परिवार से ली जाती रही, लेकिन न तो कॉलेज प्रशासन ने परिवार को इसकी जानकारी दी और न ही छात्र की अनुपस्थिति को लेकर कोई कदम उठाया।
अगस्त 2025 में इस छात्र ने आत्महत्या कर ली। उसका सुसाइड नोट पढ़कर मन विचलित हो जाता है। हालाँकि उसके इस कदम के पीछे की पूरी वजह साफ़ नहीं है, लेकिन यह घटना कई सवाल खड़े करती है।
क्या केवल फीस लेना ही किसी विश्वविद्यालय का काम है?
अगर छात्र लगातार कक्षाओं में अनुपस्थित रहा, तो प्रशासन ने परिवार को क्यों नहीं बताया? क्या छात्रों की निगरानी और उनकी शिक्षा की ज़िम्मेदारी इतनी बड़ी संस्थाओं की नहीं होती?
यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
बिहार जैसे राज्यों से आने वाले छात्र, जो बड़े सपनों और परिवार की गाढ़ी कमाई लेकर इन तथाकथित प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाख़िला लेते हैं, अक्सर सबसे बड़े शिकार बनते हैं। उनके भविष्य और उनकी मेहनत के साथ व्यापारिक रवैया अपनाना शिक्षा जगत के लिए शर्मनाक है।
यह सिर्फ़ एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि पूरे समाज की आवाज़ है। आज एक बच्चे की जान गई है, कल न जाने कितनों का भविष्य इस तरह दांव पर लगेगा।
मृतक छात्र के परिवार और सामाजिक संगठनों ने माँग की है कि इस मामले की निष्पक्ष जाँच कराई जाए और दोषियों पर सख़्त कार्रवाई की जाए।
शारदा यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।









