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‘सुधा क्यों बनी?’- प्रेम, समाज और मौन की त्रासदी

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Written by
Rishabh Rai

धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता की सबसे गहरी टीस यह नहीं है कि सुधा और चंदर का प्रेम अधूरा रह गया। असली प्रश्न यह है कि सुधा सुधा क्यों बनी? वह लड़की जिसने प्रेम किया, लेकिन उसे शब्दों तक पहुँचने नहीं दिया। वह जिसने अपने मन को त्याग दिया, लेकिन समाज को नहीं ठुकराया। यह प्रश्न केवल साहित्यिक नहीं है; यह भारतीय समाज की गहरी मानसिकता का आईना भी है।

सुधा का चरित्र भारतीय मध्यवर्गीय संस्कारों की उपज है। वह एक ऐसे घर में पली-बढ़ी लड़की है जहाँ प्रेम को स्वीकार करने से पहले कर्तव्य को निभाना सिखाया जाता है। उसके सामने परिवार की प्रतिष्ठा, पिता की इच्छा और समाज की मर्यादा का बोझ है। इन सबके बीच उसका अपना मन कहीं पीछे छूट जाता है। यही कारण है कि जब उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा निर्णय लेना चाहिए था, तब उसके होंठ मौन रह गए।

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भारतीय समाज में लड़कियों को बचपन से ही त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि प्रेम करना अपराध नहीं है, लेकिन प्रेम के लिए लड़ना अनुचित है। सुधा इसी शिक्षा की प्रतिनिधि है। वह चंदर से प्रेम करती है, लेकिन उसे पाने की इच्छा को कभी आवाज़ नहीं देती। उसे लगता है कि प्रेम का अर्थ त्याग है, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी भूल है।

चंदर का चरित्र भी इस त्रासदी का हिस्सा है। वह शिक्षित है, संवेदनशील है, लेकिन अपने ही आदर्शों का कैदी है। वह प्रेम को पवित्रता की ऐसी ऊँचाई पर रख देता है जहाँ जीवन की वास्तविकताएँ पहुँच ही नहीं पातीं। परिणाम यह होता है कि प्रेम जीवन से कट जाता है। चंदर सुधा से प्रेम करता है, लेकिन उसे पाने का साहस नहीं करता। वह अपने ही आदर्शवाद में इतना उलझ जाता है कि वास्तविक प्रेम को खो देता है।

सुधा की चुप्पी दरअसल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक पूरे युग की चुप्पी है। उस समय की सामाजिक संरचना में लड़की के लिए अपने प्रेम को स्वीकार करना आसान नहीं था। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध माना जाता था। ऐसे में प्रेम अक्सर एक निजी भावना बनकर रह जाता था, जिसे सार्वजनिक जीवन में जगह नहीं मिलती थी।

सुधा का विवाह किसी और से होना केवल एक कथानक नहीं है; यह उस व्यवस्था का प्रतीक है जहाँ व्यक्तिगत इच्छाएँ अक्सर सामाजिक अपेक्षाओं के सामने हार जाती हैं। सुधा अपने प्रेम को बचा सकती थी, लेकिन इसके लिए उसे विद्रोह करना पड़ता। और भारतीय समाज की लड़कियों को विद्रोह करना नहीं सिखाया जाता।

यही कारण है कि सुधा की विदाई केवल एक लड़की की विदाई नहीं लगती, बल्कि एक पूरे सपने का टूटना लगता है। जब वह अपने घर से विदा होती है, तब उसके साथ उसका प्रेम भी विदा हो जाता है। वह पत्नी बन जाती है, लेकिन प्रेमिका नहीं रह पाती।

इस कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रेम को बचाने के लिए दोनों ने ही त्याग का रास्ता चुना, और उसी त्याग ने प्रेम को खत्म कर दिया। प्रेम यदि केवल आदर्श बनकर रह जाए तो वह जीवन नहीं बन पाता। जीवन को जीने के लिए साहस चाहिए, और शायद वही साहस सुधा और चंदर दोनों में नहीं था।

लेकिन यहाँ सवाल केवल सुधा से नहीं पूछा जाना चाहिए। यह सवाल उस समाज से भी पूछा जाना चाहिए जिसने उसे ऐसा बनने पर मजबूर किया। यदि सुधा ने उस दिन चंदर से कहा होता-“चलो चंदर”- तो शायद कहानी अलग होती। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी, क्योंकि उसके भीतर की लड़की से पहले उसके भीतर की संस्कारी बेटी बोलती थी।

इसलिए यह कहना गलत होगा कि सुधा ने प्रेम को खो दिया। सच तो यह है कि समाज ने उससे उसका प्रेम छीन लिया। और यही इस कहानी की सबसे बड़ी त्रासदी है।

आज जब हम इस कहानी को पढ़ते हैं, तो सुधा केवल एक पात्र नहीं रह जाती। वह उन असंख्य लड़कियों का प्रतीक बन जाती है जिन्होंने अपने मन की आवाज़ को दबाकर समाज की अपेक्षाओं को चुना। सवाल आज भी वही है- आखिर कोई लड़की सुधा क्यों बने?

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