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सिनेमा से समाज तक: ‘अस्सी’ एक जरूरी दस्तक

सिनेमा से समाज तक: ‘अस्सी’ एक जरूरी दस्तक
सिनेमा से समाज तक: ‘अस्सी’ एक जरूरी दस्तक
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Written by
Rishabh Rai

आज के दौर में जब मनोरंजन प्रधान सिनेमा बॉक्स ऑफिस की गारंटी बन चुका है, ऐसे समय में अगर कोई फिल्म सीधे समाज की चेतना को झकझोरने का साहस करे तो उसे केवल फिल्म कहना उसके महत्व को कम करना होगा। निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘अस्सी’ ऐसी ही एक गंभीर और विचारोत्तेजक प्रस्तुति है। यह केवल दो घंटे की कहानी नहीं, बल्कि एक वेक-अप कॉल है- एक ऐसा आईना जिसमें समाज खुद को देखने से अक्सर बचता रहा है।

फिल्म की बुनियाद उस कड़वे सच पर रखी गई है कि देश में औसतन हर 20 मिनट में एक बलात्कार की घटना दर्ज होती है। आमतौर पर सिनेमा ऐसे संवेदनशील मुद्दों को घटना तक सीमित कर देता है, लेकिन ‘अस्सी’ कहानी को वहां से आगे बढ़ाती है जहां अधिकांश कथाएं समाप्त हो जाती हैं। यह सवाल उठाती है- क्या रेप के बाद पीड़िता की जिंदगी खत्म हो जाती है? क्या न्याय केवल प्रतिशोध है? क्या आंख के बदले आंख ही समाधान है?

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फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण है। बिना अतिनाटकीयता के यह दिखाती है कि बलात्कार केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की भी पराजय है। जब किसी आरोपी के माता-पिता को पता चलता है कि उनका बेटा इस अपराध में शामिल है, तो उनके भीतर अपराधबोध और ममता के बीच की कशमकश को बेहद संवेदनशीलता से चित्रित किया गया है। यह संकेत स्पष्ट है- हर अपराधी किसी का बेटा होता है, और हर घर को अपनी परवरिश और मूल्यों पर आत्ममंथन करना होगा।

फिल्म में कोर्ट रूम के दृश्यों में Taapsee Pannu का अभिनय प्रभावशाली है। उनके संवादों में दृढ़ता और संवेदना का संतुलन दिखता है। साथ ही कुमुद मिश्रा, जीशान अयूब और रेवती ने भी अपने किरदारों को सजीव बना दिया है। खासतौर पर वह दृश्य, जब स्कूल की प्रिंसिपल पीड़िता अध्यापिका से कहती है- स्टूडेंट पास हो गए, लेकिन स्कूल फेल हो गया- सिस्टम की सामूहिक असफलता पर करारा प्रहार है।

‘अस्सी’ यह भी बताती है कि भीड़तंत्र या त्वरित हिंसक सजा कोई स्थायी समाधान नहीं। कानून से ऊपर उठकर बदले की भावना समाज को और अस्थिर ही करेगी। फिल्म न्याय, संवेदना और जिम्मेदारी के बीच संतुलन तलाशने की अपील करती है।

अंत में कवि उदय प्रकाश की पंक्तियां फिल्म के संदेश को गहराई देती हैं- कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है। यह पंक्तियां दर्शक को निष्क्रियता के खतरे से आगाह करती हैं।

जब अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि सिनेमा समाज से कट गया है, तब ‘अस्सी’ जैसी फिल्म उम्मीद जगाती है। यह केवल देखने की नहीं, समझने और आत्मचिंतन की फिल्म है। ऐसे सिनेमा को समर्थन मिलना जरूरी है, ताकि फिल्मकार सामाजिक प्रश्नों पर बेबाकी से काम करने का साहस बनाए रखें।

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