
फरवरी-मार्च का महीना आते ही देश के लाखों घरों में माहौल बदल जाता है। बोर्ड परीक्षाएं केवल छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की परीक्षा बन जाती हैं। बातचीत का केंद्र पढ़ाई और रिज़ल्ट हो जाता है। कई घरों में टीवी की आवाज़ धीमी कर दी जाती है, बाहर जाना कम कर दिया जाता है और हर दिन एक ही सवाल दोहराया जाता है-‘तैयारी कैसी है?’
हमारे समाज में परीक्षा को सिर्फ़ ज्ञान का मूल्यांकन नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला अंतिम पैमाना मान लिया गया है। अच्छे अंक मानो सफलता की गारंटी और कम अंक असफलता का प्रमाण बन जाते हैं। यही सोच बच्चों पर अनजाने में भारी दबाव डालती है। माता-पिता का उद्देश्य भले ही बच्चे का भला हो, लेकिन जब अपेक्षाएं हद से ज्यादा बढ़ जाती हैं तो वे प्रेरणा के बजाय डर में बदल जाती हैं।
‘इस बार नंबर कम नहीं आने चाहिए’, ‘फलां के बच्चे से पीछे नहीं रहना है’ जैसी बातें बच्चों के मन में यह धारणा बना देती हैं कि उनका मूल्य केवल अंकों से तय होगा। कई बार माता-पिता सीधे कुछ नहीं कहते, लेकिन उनकी चिंता, चिड़चिड़ापन और बार-बार की याद दिलाना बच्चों तक तनाव पहुंचा देता है।
इस दबाव का असर मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर दिखता है। बच्चों में घबराहट, अनिद्रा, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन आम हो जाता है। आत्मविश्वास डगमगाने लगता है और परीक्षा के समय पढ़ा हुआ भी याद नहीं रहता। पढ़ाई ज्ञान अर्जन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि असफलता से बचने का माध्यम बन जाती है।
समय आ गया है कि हम परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न बनाना बंद करें। बच्चों को यह भरोसा देना जरूरी है कि उनका मूल्यांकन केवल अंकों से नहीं होता। प्रोत्साहन, संवाद और भावनात्मक सहयोग ही उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं।
2. अपेक्षाओं का बोझ और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य: बदलनी होगी सोच
हर माता-पिता अपने बच्चे को सफल देखना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन जब यह चाहत तुलना और दबाव का रूप ले लेती है, तब समस्या शुरू होती है। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में अच्छे अंक को सुरक्षित भविष्य का टिकट माना जाने लगा है। इसी कारण माता-पिता अनजाने में बच्चों पर ऐसी अपेक्षाएं थोप देते हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं।
बच्चे लगातार यह सोचते रहते हैं कि अगर वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे तो माता-पिता निराश हो जाएंगे। यह डर धीरे-धीरे परीक्षा-भय में बदल जाता है। परिणामस्वरूप तनाव, आत्मविश्वास की कमी और भावनात्मक अकेलापन बढ़ने लगता है। कुछ मामलों में यह दबाव गंभीर मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकता है, जो समाज के लिए चिंता का विषय है।
समाधान सोच में बदलाव से शुरू होता है। माता-पिता को यह समझना होगा कि परीक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन का अंतिम सत्य नहीं। असफलता भी सीखने का एक चरण है। बच्चों की मेहनत, ईमानदारी और मानसिक संतुलन को अंकों से अधिक महत्व देना चाहिए।
स्कूलों और शिक्षकों की भूमिका भी अहम है। सकारात्मक माहौल, काउंसलिंग और प्रेरक मार्गदर्शन से परीक्षा-भय कम किया जा सकता है। साथ ही संतुलित दिनचर्या, खेल, योग और पर्याप्त विश्राम बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं।
जब परिवार सहयोगी बनेगा और अपेक्षाएं संतुलित होंगी, तभी बच्चे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा का सामना कर पाएंगे। आखिरकार, सफलता केवल अंकों से नहीं, बल्कि मजबूत व्यक्तित्व और स्वस्थ मन से तय होती है।







