
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूरोप की राजनीति में तल्ख़ी बढ़ती जा रही है। हाल ही में वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विक्टर ऑर्बन पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि जब यूक्रेन रूस से लड़ रहा है, तब कुछ यूरोपीय नेता अपनी घरेलू राजनीति और निजी आराम में उलझे हुए हैं। ज़ेलेंस्की का यह बयान केवल व्यक्तिगत आलोचना नहीं था, बल्कि यूरोप की सामूहिक सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता का संकेत भी था।
ज़ेलेंस्की ने ‘रूसी टैंकों के बुडापेस्ट की सड़कों पर लौटने’ का जिक्र करते हुए 1956 की ऐतिहासिक घटना की ओर इशारा किया, जब सोवियत संघ ने हंगरी में विद्रोह को कुचल दिया था। यह संदर्भ दरअसल एक चेतावनी थी- यदि रूस की आक्रामक नीतियों को समय रहते नहीं रोका गया, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है। उनका संदेश स्पष्ट था कि यूक्रेन की लड़ाई केवल उसकी अपनी संप्रभुता की रक्षा नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की सुरक्षा से जुड़ी है।
हंगरी और यूक्रेन के रिश्तों में पिछले कुछ वर्षों में खटास आई है। ऑर्बन पर रूस के प्रति नरम रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर उन्होंने कई बार सवाल उठाए हैं और यह तर्क दिया है कि इन प्रतिबंधों से रूस से अधिक नुकसान यूरोपीय देशों को हो रहा है। इतना ही नहीं, यूक्रेन की यूरोपीय संघ सदस्यता पर भी हंगरी ने आपत्ति जताई है। 2022 में रूस के हमले के बाद जब यूक्रेन ने EU में शामिल होने के लिए आवेदन किया, तो हंगरी के वीटो के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
ज़ेलेंस्की का एक और महत्वपूर्ण संदेश अमेरिका और यूरोप के बदलते रिश्तों को लेकर था। उन्होंने संकेत दिया कि डोनाल्ड ट्रम्प के दौर में अमेरिका यूरोप को पहले जैसा साझेदार नहीं मान रहा। उनका कहना था कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए अधिक आत्मनिर्भर होना होगा और एक साझा यूरोपीय सेना के गठन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह विचार नया नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में इसे नई प्रासंगिकता मिली है।
ज़ेलेंस्की ने यह भी स्पष्ट किया कि यूक्रेन से जुड़े किसी भी निर्णय में उसकी भागीदारी अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि न तो ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन अकेले बैठकर इस युद्ध का भविष्य तय कर सकते हैं, और न ही कोई अन्य नेता। स्थायी शांति के लिए सामूहिक दबाव और बहुपक्षीय संवाद जरूरी है। उनका यह रुख यूक्रेन की संप्रभुता और आत्मसम्मान की रक्षा का प्रतीक है।
दूसरी ओर, ऑर्बन का कहना है कि हंगरी इस युद्ध में सैनिक, हथियार या धन नहीं भेजेगा। उनका तर्क है कि यह हंगरी का युद्ध नहीं है और देश को अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए। वे सीधे मॉस्को से कूटनीतिक बातचीत की वकालत करते रहे हैं। उनका यह दृष्टिकोण यूरोप के भीतर मतभेदों को उजागर करता है- एक तरफ वे देश हैं जो रूस के खिलाफ कड़े कदमों का समर्थन करते हैं, और दूसरी ओर वे जो संतुलित या तटस्थ रुख अपनाने की कोशिश कर रहे हैं।
स्पष्ट है कि रूस-यूक्रेन युद्ध केवल दो देशों के बीच संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह यूरोप की एकता, सुरक्षा और वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा बन चुका है। ज़ेलेंस्की का आह्वान यूरोप को एकजुट होकर बोलने का है, जबकि ऑर्बन राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर जोर देते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यूरोप सामूहिक सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ता है या आंतरिक मतभेद उसकी रणनीति को कमजोर करते हैं।






