
बजट: आंकड़ों से आगे, हर घर की जरूरतों से जुड़ा फैसला
नई दिल्ली। हर साल 1 फरवरी को पेश होने वाला केंद्रीय बजट सिर्फ सरकारी आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि आम आदमी की जिंदगी से सीधे जुड़ा होता है। बजट तय करता है कि दाल-रोटी कितनी महंगी होगी, बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च होगा, इलाज सस्ता होगा या नहीं और नौकरी के कितने अवसर बनेंगे।
भारत में बजट की परंपरा अंग्रेजी शासन में 1860 से शुरू हुई थी, जबकि आज़ाद भारत का पहला बजट 26 नवंबर 1947 को आर.के. शनमुखम चेट्टी ने पेश किया था। आज़ादी के 79 सालों में अब तक 92 बजट पेश हो चुके हैं, जिनमें पूर्ण, अंतरिम और अतिरिक्त बजट शामिल हैं।
बजट बनाने की प्रक्रिया करीब छह महीने पहले शुरू होती है, जिसमें मंत्रालयों, राज्यों, विशेषज्ञों और नीति आयोग से सलाह ली जाती है। टैक्स, महंगाई, सब्सिडी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी—सब कुछ बजट से तय होता है। इसलिए बजट का असर सीधे हर परिवार की जेब और भविष्य पर पड़ता है।









