
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में पुलिस मुठभेड़ में आरोपी के पैरों में गोली मारने की घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कोर्ट ने कहा कि सजा देना और आरोपी के अधिकारों का फैसला करना न्यायपालिका का काम है, पुलिस का यह कर्तव्य नहीं है कि वह अपनी इच्छा से किसी को चोट पहुंचाए या मृत्युदंड दे।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि पुलिस केवल कानून के अनुसार गिरफ्तारी और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभा सकती है। अदालत ने कहा कि किसी आरोपी के पैर में गोली मारना या मुठभेड़ में अतिरिक्त बल प्रयोग करना कानून और मानवाधिकारों के उल्लंघन के बराबर है। न्यायमूर्ति ने कहा, सजा और न्याय देने का अधिकार केवल अदालतों का है, और पुलिस का काम केवल जांच और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। किसी भी स्थिति में पुलिस खुद न्यायाधीश नहीं बन सकती।
इस मामले की पृष्ठभूमि में, पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी फरार होने का प्रयास कर रहा था और उसे नियंत्रित करने के लिए पैर में गोली मारी गई। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि आरोपी की जान को खतरा न होते हुए भी पुलिस ने अनुचित बल प्रयोग किया, जो कानून के अनुरूप नहीं है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि इस घटना की पूरी जांच स्वतंत्र अधिकारियों द्वारा कराई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों को मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएँ न हों।
यह फैसला पुलिस मुठभेड़ों और फिरौती या फरार आरोपी पर बल प्रयोग जैसे मामलों में कानून की मर्यादा और जवाबदेही को स्पष्ट करता है। हाईकोर्ट का यह रुख यह भी संदेश देता है कि न्यायपालिका और पुलिस की भूमिकाएँ अलग हैं और पुलिस को अपने अधिकारों का सही उपयोग करना चाहिए।








