
भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस 2026 की पहली शाम को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की, जिसमें उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल मूल के प्रसिद्ध बुनकर खेमराज सुंदरियाल का नाम भी शामिल है। वर्तमान में हरियाणा के पानीपत निवासी खेमराज सुंदरियाल को हैंडलूम और बुनाई कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। उनका जीवन संघर्ष, साधना और समर्पण की मिसाल है।
खेमराज सुंदरियाल का जन्म 2 फरवरी 1943 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से गांव सुमाड़ी में हुआ। सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कुछ बड़ा करने का सपना देखा। वर्ष 1964 में उन्होंने श्रीनगर (गढ़वाल) से वीविंग में डिप्लोमा प्राप्त किया और बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली का रुख किया। प्रारंभ में उन्होंने कपड़ा मिल में नौकरी की, लेकिन वहां मन न लगने पर वे बुनकर सेवा केंद्र, दिल्ली से जुड़ गए। यहां उन्हें देश के प्रसिद्ध डिजाइनरों के साथ काम करने और बुनाई कला को निखारने का अवसर मिला।
बाद में उनका स्थानांतरण बनारस हुआ, जहां उन्हें टेपेस्ट्री कला से गहरा लगाव हो गया। यह कला रंगीन धागों से की जाने वाली भित्ति चित्र बुनाई है। खेमराज सुंदरियाल ने इस कला में दक्षता हासिल कर इसे देश में नई पहचान दिलाई।
वर्ष 1975 में वे हरियाणा के पानीपत स्थित बुनकर सेवा केंद्र पहुंचे, जिसे उन्होंने अपनी कर्मभूमि बना लिया। यहां उन्होंने नए डिजाइनों के साथ बुनकरों को प्रशिक्षण देकर भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को नई दिशा दी। उनके बनाए डिजाइनों को देश-विदेश में सराहा गया।
खेमराज सुंदरियाल को इससे पहले भी कई राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कार मिल चुके हैं। केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया कबीर सम्मान पाने वाले वे पहले व्यक्ति रहे। अब पद्म श्री सम्मान के साथ वे देश के उन अनसंग हीरोज में शामिल हो गए हैं, जिनका योगदान समाज और कला दोनों के लिए अमूल्य है। उनका जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो यह सिखाता है कि मेहनत, लगन और धैर्य से किसी भी छोटे गांव से निकलकर बड़ी पहचान बनाई जा सकती है।








