
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में डीप स्टेट शब्द अब केवल साजिश सिद्धांत तक सीमित नहीं रहा है। कोल्ड वॉर के दौर से लेकर आज वेनेजुएला संकट तक, यह बहस बार-बार उभरती रही है कि क्या कुछ स्थायी सत्ता-संरचनाएं-जैसे सैन्य-औद्योगिक तंत्र, खुफिया एजेंसियां, बड़ी कॉरपोरेट लॉबी और नीति-निर्माण से जुड़े हित समूह- लोकतांत्रिक सरकारों से अधिक प्रभावशाली हो गई हैं। वेनेजुएला के संदर्भ में अमेरिका की कठोर नीतियों और सैन्य दबाव को इसी बहस के फ्रेम में देखा जा रहा है, हालांकि इसे कब्जा कहना राजनीतिक आरोप और व्याख्या का विषय है, न कि सर्वसम्मत तथ्य।
कोल्ड वॉर के समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक टकराव केवल खुले युद्ध तक सीमित नहीं था। लैटिन अमेरिका, एशिया और अफ्रीका में सत्ता परिवर्तन, सैन्य तख्तापलट और आर्थिक प्रतिबंधों के पीछे अक्सर अदृश्य शक्ति-संरचनाओं की भूमिका बताई जाती रही। चिली (1973), ईरान (1953) और निकारागुआ जैसे उदाहरणों में निर्वाचित सरकारों के खिलाफ हस्तक्षेप के आरोप लगे। इन घटनाओं ने डीप स्टेट की अवधारणा को जन्म दिया- एक ऐसी व्यवस्था जो चुनी हुई सरकारों से परे जाकर रणनीतिक हित साधती है।
वेनेजुएला आज इसी बहस का केंद्र है। तेल-समृद्ध यह देश लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों, राजनीतिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीकरण का सामना कर रहा है। वॉशिंगटन का तर्क है कि ये कदम लोकतंत्र और मानवाधिकारों के समर्थन में हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि असली मकसद ऊर्जा संसाधनों और भू-राजनीतिक प्रभाव को नियंत्रित करना है। हालिया घटनाक्रमों को लेकर दुनिया के कई देशों- चीन, रूस और कुछ लैटिन अमेरिकी राष्ट्रों- ने चिंता जताई है। भारत ने भी संतुलित रुख अपनाते हुए लोगों की सुरक्षा और संवाद के जरिए समाधान पर जोर दिया है।
यहां सवाल उठता है कि क्या ऐसे निर्णय लोकतांत्रिक सरकारों के नियंत्रण में होते हैं या फिर स्थायी नीति-तंत्र उन्हें दिशा देता है? अमेरिका जैसे देशों में रक्षा उद्योग, ऊर्जा कंपनियां और वित्तीय संस्थान नीति-निर्माण पर गहरा असर डालते हैं- यह बात खुद अमेरिकी राजनीतिक विमर्श में स्वीकार की जाती रही है। 1961 में राष्ट्रपति आइजनहावर ने मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स के बढ़ते प्रभाव की चेतावनी दी थी। आज उसी चेतावनी को डीप स्टेट की आधुनिक परिभाषा से जोड़ा जाता है।
भारत के लिए यह बहस क्यों अहम है? इसलिए क्योंकि भारत एक उभरती शक्ति है, जिसकी रणनीतिक स्वायत्तता उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। यदि वैश्विक राजनीति में गैर-निर्वाचित शक्ति-संरचनाएं निर्णायक होती जा रही हैं, तो भारत को अपने हितों की रक्षा के लिए और अधिक सतर्क रहना होगा। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आयात, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय प्रणालियों में आत्मनिर्भरता इसी संदर्भ में जरूरी हो जाती है। साथ ही, बहुपक्षीय कूटनीति और ग्लोबल साउथ के साथ सहयोग भारत को संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।









