
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए मामलों में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों आरोपी अगले एक वर्ष तक इस मामले में जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकेंगे। हालांकि, इसी केस में बंद पांच अन्य आरोपियों को 12 सख्त शर्तों के साथ जमानत दे दी गई है।
यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन के आरोप और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में “केंद्रीय और गंभीर” प्रतीत होती है। अदालत ने माना कि दोनों की हिरासत की अवधि लंबी रही है, लेकिन यह न तो संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है और न ही यूएपीए जैसे विशेष कानून के प्रावधानों को निष्प्रभावी करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनुच्छेद 21 संविधान की आत्मा है और ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि राज्य की सुरक्षा और अखंडता से जुड़े मामलों में देरी को जमानत का स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता। यूएपीए के तहत जमानत के लिए कड़े मानक तय हैं और अदालत उन्हीं के अनुरूप फैसला दे रही है।
गौरतलब है कि उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पिछले 5 साल 3 महीने से तिहाड़ जेल में बंद हैं। इन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान, शादाब अहमद और शिफा उर रहमान को सशर्त जमानत देते हुए कहा कि इससे उनके खिलाफ लगे आरोप कमजोर नहीं होते। यदि किसी भी शर्त का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा।
दिल्ली पुलिस ने जमानत का विरोध करते हुए दावा किया कि आरोपी दंगों के मुख्य साजिशकर्ता थे और सुनवाई में देरी के लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं। पुलिस का यह भी कहना है कि आरोपी चाहते थे कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान दंगे कराकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाए।









