
नई दिल्ली लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। बीते दिनों संसद में दिए अपने बयान और आज हुए विपक्षी दलों के जोरदार विरोध प्रदर्शन ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार, खासकर बीजेपी, की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य में सीधे तौर पर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उंगली उठाई, यह आरोप लगाते हुए कि आयोग लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और स्वतंत्रता को बचाने में नाकाम हो रहा है। उनका यह आरोप सिर्फ़ राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि आंकड़ों, हालिया घटनाओं और जनता के अनुभवों पर आधारित एक सख्त चेतावनी थी — लोकतंत्र की जड़ें खोखली की जा रही हैं।
आज हुए विपक्षी मार्च ने इस बयान को और वजन दे दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य दलों के नेताओं ने सड़कों पर उतरकर न सिर्फ चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए, बल्कि बीजेपी पर संस्थाओं को अपने राजनीतिक हित में इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाया। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को हिरासत में लिया गया — यह अपने आप में बताता है कि सत्ता के गलियारों में इस आवाज़ से कितनी बेचैनी है। दो महिला सांसदों के बेहोश होने तक की खबर आई, जो बताती है कि हालात सिर्फ गरम नहीं, बल्कि खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुके हैं।
बीजेपी की ओर से हमेशा की तरह इसे “नाटकीय राजनीति” बताया गया, लेकिन सच्चाई यह है कि जनता के बीच यह सवाल गूंज रहा है — क्या भारत में चुनाव अब सिर्फ नाम के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं? क्या चुनाव आयोग सत्ता के दबाव में है?
राहुल गांधी का संदेश साफ है — लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ भाषणों से नहीं, बल्कि सड़कों से होगी, जनआंदोलनों से होगी, और सत्ता से सवाल पूछने के साहस से होगी। आज का दिन विपक्ष की एकजुटता और सत्ता के अहंकार के टकराव का प्रतीक बन गया।
अगर चुनाव आयोग अपनी साख और जनता का भरोसा बचाना चाहता है, तो उसे अब सिर्फ बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से जवाब देना होगा। वरना इतिहास गवाह रहेगा कि एक समय ऐसा भी था जब लोकतंत्र की रक्षा का जिम्मा जनता ने खुद अपने हाथ में ले लिया था — और राहुल गांधी इस लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर थे।









