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पंखों से नहीं, हौसलों से उड़ान होती है- डॉ. ज्ञानानंददास स्वामी 

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Written by
Rishabh Rai

मनुष्य का जीवन केवल साधनों से नहीं, संकल्प से ऊँचा उठता है। बाहरी उपकरण, परिस्थितियाँ और सुविधाएँ जीवन की यात्रा को सरल अवश्य बनाती हैं, परंतु वे स्वयं उड़ान नहीं देतीं। उड़ान का वास्तविक आधार भीतर का उत्साह, साहस और अटल विश्वास होता है। इसलिए कहा गया है, ‘केवल पंखों से कुछ नहीं होता, उड़ान तो हौसलों से होती है’।

प्रकृति का यह नियम जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उतना ही सत्य प्रतीत होता है। बीज को ही देखिए। हर बीज के भीतर वृक्ष बनने की संभावना छिपी होती है, पर सभी बीज विशाल वृक्ष नहीं बनते। कुछ बीज मिट्टी में पड़कर भी अंकुरित नहीं होते, वे वहीं दबे रह जाते हैं। पर वही बीज यदि भीतर से जीवन की शक्ति और संघर्ष का साहस जुटा ले, तो कठोर मिट्टी को चीरकर बाहर निकल आता है। धीरे-धीरे वह अंकुर बनता है, फिर पौधा, और एक दिन वही बीज विशाल वृक्ष का रूप ले लेता है।

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अंतर बीज के आकार में नहीं होता, बल्कि उसके भीतर छिपी जीवनी-शक्ति और संघर्ष करने की क्षमता में होता है। यही बात मनुष्य के जीवन पर भी लागू होती है। अवसर तो अनेक लोगों को मिलते हैं, पर जो व्यक्ति साहस और दृढ़ निश्चय से आगे बढ़ता है, वही अपनी संभावनाओं को साकार कर पाता है।

आज संसार में साधनों की कोई कमी नहीं है। ज्ञान के द्वार खुले हैं, अवसर भी अनेक हैं। फिर भी अनेक लोग जीवन में आगे नहीं बढ़ पाते। इसका कारण साधनों का अभाव नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का अभाव है। जिस मन में हिचक और भय बसे हों, वहाँ सामर्थ्य होते हुए भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ पाता। इसके विपरीत, जिसका हृदय साहस से भरा हो, वह सीमित साधनों में भी अद्भुत उपलब्धियाँ प्राप्त कर लेता है।

इतिहास के पृष्ठ ऐसे अनेक महापुरुषों से भरे हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने हौसले को टूटने नहीं दिया। जब मार्ग कठिन हुआ, तब उन्होंने कदम रोकने के स्थान पर अपने संकल्प को और दृढ़ किया। उनके पास बड़े साधन नहीं थे, परंतु उनके भीतर अडिग विश्वास था कि वे अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुँचेंगे। यही विश्वास उनके लिए पंख बन गया।

वास्तव में मनुष्य का सबसे बड़ा बल उसका मन है। जब मन जाग्रत होता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है। जो व्यक्ति अपने भीतर यह निश्चय कर लेता है कि उसे आगे बढ़ना है, उसे कोई शक्ति अधिक समय तक रोक नहीं सकती। कठिनाइयाँ अवश्य आती हैं, पर वे उसके साहस को और प्रखर बना देती हैं। जैसे पर्वत से टकराकर नदी रुकती नहीं, बल्कि नया मार्ग बनाती है, वैसे ही दृढ़ निश्चय वाला मनुष्य भी बाधाओं के बीच अपना रास्ता बना लेता है।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति केवल सुविधाओं पर निर्भर रहता है, उसका जीवन स्थिर हो जाता है। वह अवसर की प्रतीक्षा करता रहता है, परंतु अवसर साहसी लोगों के पास स्वयं चलकर आते हैं। हौसला जीवन की वह ज्योति है जो अंधकार में भी दिशा दिखाती है। यह मनुष्य को यह विश्वास देती है कि गिरने के बाद भी उठना संभव है और हार के बाद भी विजय प्राप्त की जा सकती है।

महंत स्वामी महाराज समझाते हैं कि मनुष्य का वास्तविक उत्थान तब आरंभ होता है जब वह अपने भीतर की शक्ति को पहचान लेता है। बाहरी पंख सीमित हो सकते हैं, परंतु हौसलों के आकाश की कोई सीमा नहीं होती। जो अपने मन में साहस का दीपक जला लेता है, उसके लिए हर दिशा खुल जाती है। वह कठिन मार्ग को भी अपनी यात्रा का साधन बना लेता है।

जी हाँ, जीवन की ऊँचाइयाँ केवल साधनों से नहीं मिलतीं, उसके लिए ऊँचे हौसले चाहिए।

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