
ईरान ने हाल ही में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की धमकी दी है और कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि उसने इसे अस्थायी रूप से बंद भी कर दिया है। सवाल उठता है कि जबकि ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच लड़ाई चल रही है, उसने इस रणनीतिक जलमार्ग को बंद करने की बात क्यों कही है। इसके पीछे की वजह साफ है: ईरान वैश्विक तेल बाजार और राजनीतिक दबाव के माध्यम से अमेरिका और उसके सहयोगियों पर प्रभाव डालना चाहता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल व्यापार मार्गों में से एक है। इस संकीर्ण जलडमरूमध्य से प्रतिदिन दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल गुजरता है और भारत की लगभग 60 प्रतिशत तेल आवश्यकता इसी मार्ग से पूरी होती है। ईरान इस मार्ग को बंद कर दुनिया को बड़ा संदेश देना चाहता है कि यदि उसका देश या हित प्रभावित किया गया तो वह गंभीर कार्रवाई करेगा। ईरान ने कहा है कि वह यहां से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाने के साथ समुद्र में बिछे तेल केबल और पाइपलाइन को भी ड्रोन हमलों के जरिए नष्ट कर सकता है।
यदि ईरान ऐसा करता है, तो इस पूरे इलाके से तेल की एक भी बूंद बाहर नहीं निकल पाएगी। इससे वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी और चीन, भारत जैसी बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऊर्जा संकट पैदा होगा। चीन अब तक ईरान का लगभग 80 प्रतिशत तेल खरीदता रहा है, जबकि भारत खाड़ी के देशों जैसे सऊदी अरब, ओमान, बहरीन, इराक और कुवैत से तेल मंगवाता है। मार्ग अवरुद्ध होने पर भारत को अपनी तेल आपूर्ति के लिए नई व्यवस्था करनी पड़ेगी, जो महीनों या सालों का समय ले सकती है। इस दौरान तेल की कमी और महंगे तेल की वजह से देश में महंगाई बेतहाशा बढ़ेगी।
महंगाई का असर सीधे आम जनता पर पड़ेगा। दैनिक जीवन में आवश्यक वस्तुएँ- फल, सब्ज़ी, आटा, चावल, तेल-सब महंगे हो जाएंगे। वस्तुओं की ढुलाई महंगी होगी, जिससे मूल्य श्रृंखला प्रभावित होगी। विपक्ष इस पर सरकार से सवाल करेगा कि महंगाई रोकने के लिए क्या किया जा रहा है। वैश्विक स्तर पर भी तेल की कीमतें बढ़ेंगी और दुनिया के कई देशों में महंगाई का दबाव पैदा होगा। ईरान का उद्देश्य स्पष्ट है: युद्ध और अस्थिरता के माध्यम से दुनिया को परेशान करना और अमेरिका-इजरायल पर दबाव बनाना।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और आगे हिंद महासागर तथा वैश्विक समुद्री व्यापार मार्गों तक पहुंच प्रदान करता है। अपने सबसे संकरे हिस्से में यह जलमार्ग केवल 33 किलोमीटर चौड़ा है। ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल पर इसका नियंत्रण है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के अनुसार सभी देशों के जहाज निर्धारित गलियारों से गुजर सकते हैं। दुबई जैसे बड़े व्यावसायिक केंद्र इसके पास होने के कारण इस मार्ग को वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए संवेदनशील “चोक पॉइंट” में बदल देता है।
आधुनिक ऊर्जा प्रणाली के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब, कुवैत, इराक, कतर, बहरीन, यूएई और ईरान से तेल और गैस ले जाने वाले टैंकर इसी मार्ग का उपयोग करते हैं। अधिकांश आपूर्ति एशियाई देशों की ओर जाती है, जो बढ़ती ऊर्जा मांग और खाड़ी देशों पर उनकी रणनीतिक निर्भरता को दर्शाती है। वर्ष 2025 में प्रतिदिन लगभग 1.3 करोड़ बैरल तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरा, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 31 प्रतिशत है।
वर्तमान में सुरक्षा की दृष्टि से स्थिति गंभीर है। प्रमुख शिपिंग कंपनियों जैसे मेर्यस्क, हैपैग लॉयड, MSC, Maersk, CMA CGM और Cosco ने अपने जहाजों को सुरक्षित स्थानों पर रुकने और स्ट्रेट में प्रवेश करने से रोकने के निर्देश दिए हैं। ब्रिटेन की समुद्री प्राधिकरण ने कई जहाजों पर हमलों और नेविगेशन सिस्टम जाम किए जाने की घटनाओं की सूचना दी है। ओमान की खाड़ी में ड्रोन हमलों से एक तेल टैंकर के नाविक की मृत्यु भी हो गई।
इस पूरी स्थिति में भारत की चुनौतियाँ स्पष्ट हैं। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अवरुद्ध रहता है, तो तेल की आपूर्ति बाधित होगी और महंगाई बढ़ेगी। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक मार्ग, भंडार और रणनीतिक तेल भंडारण पर निर्भर रहना पड़ेगा। यह आसान काम नहीं है; नई व्यवस्था बनाने में महीनों या साल लग सकते हैं।
संक्षेप में, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की संवेदनशीलता और ईरान की धमकी ने वैश्विक तेल व्यापार और भारत की आर्थिक स्थिरता पर सीधे असर डाला है। यह केवल ऊर्जा संकट ही नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय दबाव का संकेत है। भारत और अन्य देशों को तत्काल सतर्कता, रणनीतिक योजना और कूटनीतिक सक्रियता दिखानी होगी, अन्यथा वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।






