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भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर चोट: रणनीतिक असफलताओं का विश्लेषण

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज
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Written by
Rishabh Rai

ईरान और अमेरिका के बीच हालिया तनाव ने एक बार फिर भारत की अंतरराष्ट्रीय नीतियों और कूटनीतिक संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। स्ट्रेट ऑफ होरमुज में चीन के जहाजों को अनुमति देने और अन्य देशों को जाने पर मार डूबाने की चेतावनी के बीच, भारत इस क्षेत्र की रणनीतिक अस्थिरता में फंसता नजर आ रहा है। यह केवल एक सुरक्षा या आर्थिक चुनौती नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक साख और रणनीतिक दूरदर्शिता पर गंभीर चोट है।

इतिहास गवाह है कि ईरान ने भारत के हितों के लिए कितनी स्थिर भूमिका निभाई है। दशकों तक ओआईसी में भारत विरोधी प्रस्तावों को रोकना, सस्ता तेल उपलब्ध कराना, और चाबहार पोर्ट जैसी परियोजनाओं के माध्यम से भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ना, ईरान की रणनीतिक मित्रता के उदाहरण हैं। इसके बावजूद हालिया घटनाओं में भारत ने ईरान पर हमले और उसके आत्मरक्षात्मक कदमों की आलोचना की। यह केवल नीतिगत गलती नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न है।

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वर्तमान समय में भारत ने कई पड़ोसी देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ अपने रिश्तों को कमजोर कर दिया है। पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, भूटान, म्यांमार और बांग्लादेश तक के साथ बिगड़ते रिश्ते, अमेरिका की नकल में अंधानुकरण, और चीन के सामने कमजोर रणनीतिक व्यवहार ने भारत की स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह स्पष्ट है कि ट्रम्प या किसी भी अमेरिकी प्रशासन के दरबारी बनने के प्रयास ने भारत की स्वतंत्र कूटनीतिक छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है।

सिर्फ पड़ोसी देशों तक ही नहीं, बल्कि रूस के साथ रिश्तों में भी खिंचाव आया है। आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से भारत ने अपनी दीर्घकालिक सुरक्षा और विकास योजनाओं को खतरे में डाल दिया है। ऐसे समय में ईरान के साथ गलत संदेश देना या उसकी आत्मरक्षा की आलोचना करना भारत की साख और रणनीतिक प्रभाव को और कमजोर करता है।

चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया के कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट जैसी रणनीतिक पहलें, जो भारत के आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं, इन नीतिगत भूलों से प्रभावित हो सकती हैं। अमेरिका और इजरायल के युद्ध प्रयास, और भारत की मौन या आलोचनात्मक प्रतिक्रिया, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को कमजोर और अस्थिर स्थिति में रख रही हैं।

यह समय भावनात्मक या अंधानुकरण समर्थन का नहीं है। जनता और समर्थक वर्ग की अंधभक्ति, और नीतिगत अक्षमता को नकारने की प्रवृत्ति, भारत की दीर्घकालिक हितों के लिए घातक साबित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय साख और भरोसेमंद छवि केवल सैन्य या आर्थिक ताकत पर निर्भर नहीं करती, बल्कि समझदारी, संतुलन और दूरदर्शिता पर भी निर्भर करती है।

यदि भारत ने अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए समय रहते ठोस और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में उसकी वैश्विक स्थिति गंभीर रूप से कमजोर हो सकती है। यह केवल अमेरिका या चीन की नीतियों की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि भारत की आंतरिक नीतिगत कमजोरी, पड़ोसी देशों के साथ बिगड़े रिश्ते और अंतरराष्ट्रीय मंच पर संतुलन न बनाए रखने का परिणाम है।

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