
‘पहला प्रेम, पहली किताब और पहली फ़िल्म हमेशा ख़ास होती है’- एक लेखक हिमांशु की कही यह पंक्ति जैसे किसी पुराने गीत की तरह मन में बजती रहती है। पर शायद उससे भी पहले कुछ और ख़ास होता है- पहला शब्द। वही शब्द जो होंठों तक आते-आते काँपता है, जो दिल की धड़कनों के बीच रास्ता बनाता है, और जिसे कह देने के बाद दुनिया कभी वैसी नहीं रहती जैसी पहले थी।
तुम्हारे वादे – राजनीतिक जुमले उसी पहले शब्द की तरह है- थोड़ा संकोची, थोड़ा बेचैन, लेकिन पूरी तरह सच्चा। यह संग्रह केवल कविताओं का नहीं, धड़कनों का दस्तावेज़ है। भदोही की गलियों से लेकर सपनों की अनजानी सड़कों तक की यात्रा इन पन्नों में सांस लेती है। गाँव की मिट्टी की महक और शहर की रोशनी का आकर्षण- दोनों मिलकर एक ऐसी भावभूमि रचते हैं जहाँ प्रेम सिर्फ एक भावना नहीं, बल्कि जीने का कारण बन जाता है।
इन कविताओं में प्रेम है- जो पहली नज़र में ठहर जाता है। बिछड़ाव है- जो चुपचाप भीतर घर बना लेता है। यादें हैं- जो रात के सन्नाटे में आकर कंधे पर हाथ रख देती हैं। और उम्मीद है- जो हर टूटन के बाद भी दिल में एक छोटी-सी रोशनी जला देती है। यहाँ प्रेम किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं; वह उन सभी क्षणों में बसा है जब दिल ने पहली बार किसी के लिए अलग ढंग से धड़कना सीखा।
हर कविता जैसे एक अधूरा ख़त है- किसी के नाम लिखा गया, पर कभी भेजा नहीं गया। हर पंक्ति में वह कंपन है जो किसी के सामने अपने मन की बात कहने से पहले महसूस होती है। यह संग्रह पाठक से उत्तर नहीं माँगता; बस चाहता है कि आप अपने भीतर छिपे उस पहले प्रेम, उस पहले वादे, उस पहले टूटे सपने को याद करें।
अगर इन पन्नों के बीच आपको भी कभी लगे कि ‘यह तो मेरी ही कहानी है’, तो समझिए कि कवि का पहला शब्द आपके दिल तक पहुँच गया है। और शायद यही किसी भी प्रेमिल रचना की सबसे बड़ी जीत होती है।









