
हरदीप सिंह पुरी और नैतिक जिम्मेदारी का सवाल
11 फरवरी 2026 की प्रेस कांफ्रेस में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने अपने विवादित एपस्टीन मुलाकात और ईमेल संवाद पर सफ़ाई दी। उनका दावा था कि मुलाकात डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया के विषय में हुई थी। लेकिन इस सफ़ाई ने जितने सवाल हल करने थे, उन्होंने उतने ही नए सवाल पैदा कर दिए हैं।
सबसे पहला सवाल यही है कि डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया दोनों योजनाएँ एक साल बाद, यानी 2015 में लॉन्च हुई थीं। ऐसे में मंत्री को इन योजनाओं की इतनी जानकारी पहले से कैसे थी, यह जनता और विपक्ष दोनों के लिए अचरज का विषय है। यदि यह जानकारी उनके पास थी, तो इसका स्रोत और उद्देश्य क्या था, इसे स्पष्ट करना अनिवार्य है।
दूसरा सवाल नैतिक जिम्मेदारी का है। देश में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब नेताओं ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दिया। एम जे अकबर पर यौन शोषण के आरोप लगे थे, तब पури ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था। सवाल यही उठता है कि अगर पूर्व में नैतिक जिम्मेदारी का मापदंड यह था कि ऐसे आरोपों में इस्तीफ़ा देना चाहिए, तो एपस्टीन मुलाकात जैसे विवादास्पद मामले में इसे क्यों लागू नहीं किया गया। क्या सत्ता में बने रहने की प्राथमिकता नैतिक जिम्मेदारी से ऊपर है?
सरकार ने इसे केवल “व्यावसायिक चर्चा” और “पॉलिसी इंटरेक्शन” के रूप में पेश किया। लेकिन यह बहाना जनता को संतुष्ट नहीं कर रहा। विपक्ष और मीडिया ने भी इसे नैतिक दृष्टि से असंगत बताया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में पुख्ता जवाब देने की बजाय अस्पष्टता ने संदेह और अनिश्चितता को बढ़ाया है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि मंत्री क्यों और किस उद्देश्य से ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में थे।
सामाजिक दृष्टि से भी मामला संवेदनशील है। एपस्टीन जैसे व्यक्तित्व से जुड़ी मुलाकातें केवल निजी या व्यावसायिक नहीं मानी जा सकतीं। उनके कार्यों और उनके नेटवर्क को देखते हुए, किसी भी सार्वजनिक पद पर रहे व्यक्ति के लिए इसका नैतिक और राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा है। इसीलिए कई लोग यह मानते हैं कि सिर्फ सफ़ाई देना पर्याप्त नहीं है; स्पष्ट और पारदर्शी जवाब देना जरूरी है।
इसी बीच, मंत्री की प्रेस कांफ्रेस में दिए गए जवाबों ने कई और सवाल खड़े कर दिए। डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया योजनाओं का संदर्भ देने का तर्क जनता को आश्वस्त करने के बजाय उलझन में डाल रहा है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह केवल बहाना था या सच में यह चर्चा इन योजनाओं से जुड़ी थी। यदि यह सच था, तो दस्तावेज, ईमेल या बैठक रिकॉर्ड जनता के सामने क्यों नहीं लाए गए? पारदर्शिता ही इस विवाद का सबसे बड़ा समाधान हो सकता था।
राजनीतिक दृष्टि से भी मामला संवेदनशील है। विपक्ष ने इसे सत्ता और नैतिक जिम्मेदारी के बीच टकराव के रूप में पेश किया है। यह न केवल सरकार की छवि के लिए चुनौतीपूर्ण है, बल्कि जनता के विश्वास को भी प्रभावित कर सकता है। एक लोकतंत्र में नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक कार्यों में नैतिकता का पालन करें। यदि इस मानक को केवल कानूनी दृष्टि तक सीमित रखा गया, तो जनता के लिए यह संदेश स्पष्ट नहीं होता कि सत्ता और नैतिक जिम्मेदारी के बीच कोई संतुलन मौजूद है।
अर्थव्यवस्था और विकास की योजनाओं की चर्चा करना निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन यह बहस तब तक सार्थक नहीं होगी जब तक विवादास्पद मुलाकात और उससे जुड़े सवालों पर स्पष्टता नहीं दी जाती। यह मामला केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं है, बल्कि सार्वजनिक नैतिकता, राजनीतिक जवाबदेही और जनता के विश्वास से जुड़ा है। इसलिए इसे हल्के में लेना या केवल सफ़ाई देना पर्याप्त नहीं है।
भविष्य के लिए यह संदेश साफ़ है। सत्ता में बने रहने की महत्वाकांक्षा और नैतिक जिम्मेदारी के बीच कोई समझौता नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में नेताओं की जिम्मेदारी केवल कानूनी रूप से सुरक्षित रहने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जनता यह देखना चाहती है कि उच्च पद पर रहे व्यक्ति अपने कार्यों और संपर्कों के प्रति पारदर्शी और जवाबदेह हैं।
इस विवाद ने एक बार फिर साबित किया कि नैतिक जिम्मेदारी केवल तब लागू नहीं होती जब व्यक्तिगत आरोप सीधे कानून के दायरे में आते हैं। इससे आगे, सार्वजनिक पद पर रहे किसी भी व्यक्ति को अपने कार्यों, मुलाकातों और संवाद के प्रति स्पष्ट और पारदर्शी होना चाहिए। इस्तीफ़ा केवल अंतिम उपाय नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का सबसे स्पष्ट संकेत हो सकता है।
अंत में, हरदीप सिंह पुरी का मामला हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी कानून से भी ऊपर है। सत्ता में बने रहने का अधिकार तभी वास्तविक होता है जब जनता का विश्वास सुरक्षित रहे। इस विवाद का निपटारा केवल स्पष्टता, पारदर्शिता और जवाबदेही के माध्यम से ही संभव है।







