
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) एम.एम. नरवणे की चर्चित अप्रकाशित किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के लीक मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है। पुलिस ने इसे एक बड़ा प्रकाशन उल्लंघन करार दिया है, क्योंकि किताब को रक्षा मंत्रालय या किसी अन्य संबंधित अधिकारियों से मंजूरी प्राप्त नहीं हुई थी। इसके बावजूद, किताब की प्री-प्रिंट कॉपी और पीडीएफ फाइल सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ग्रुप्स और कुछ ऑनलाइन बिक्री साइटों पर बिना अनुमति के फैल रही थी। इस मामले में पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और सवाल उठ रहे हैं कि यह संवेदनशील जानकारी वाली किताब आखिर लीक कैसे हुई।
किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी पूर्व आर्मी चीफ जनरल एम.एम. नरवणे की जिंदगी की कहानी है, जिसमें 2020 के गलवान घाटी युद्ध और लद्दाख में चीन के साथ सीमा झगड़े के दौरान सरकार द्वारा निर्णय न लेने का उल्लेख किया गया है। किताब में दावा किया गया है कि उस वक्त सैन्य संचालन के लिए कोई स्पष्ट हिदायतें नहीं दी गईं, जिससे हालात और बिगड़ गए। इस विवाद ने तब और तूल पकड़ा, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने किताब के कुछ हिस्सों का हवाला देते हुए सरकार पर हमला किया। उन्होंने कहा कि किताब में यह भी लिखा है कि उस समय चीनी टैंक भारतीय सीमा के करीब पहुंच गए थे, जिससे संसद में भारी बवाल मच गया और कई सांसदों को निलंबित किया गया।
पेंगुइन रैंडम हाउस का दावा
किताब के प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने साफ तौर पर कहा है कि किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न तो इसकी प्रिंट कॉपी तैयार की गई है और न ही इसे डिजिटल रूप में जारी किया गया है। ऑनलाइन पर जो कॉपियां वायरल हो रही हैं, उन्हें प्रकाशन कंपनी ने कॉपीराइट चोरी करार दिया है और बताया है कि वे इसके खिलाफ कानूनी कदम उठाने की योजना बना रही है। पेंगुइन ने यह भी बताया कि किताब 2024 तक मंजूरी का इंतजार कर रही थी, लेकिन बिना अनुमति के इसके हिस्से सार्वजनिक कर दिए गए।
पुलिस की जांच
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल इस मामले की गहरी जांच कर रही है और सोशल मीडिया तथा न्यूज वेबसाइटों पर वायरल हो रही जानकारी पर निगरानी रखी जा रही है। जांच में पता चला है कि किताब का टाइपसेट पीडीएफ कई वेबसाइटों पर उपलब्ध है। इसके अलावा, ई-कॉमर्स साइट्स पर किताब का कवर ऐसे प्रदर्शित किया जा रहा था, जैसे कि यह बिक्री के लिए तैयार हो। पुलिस ने इस मामले में डिजिटल स्रोतों, लीक करने वालों और इसे संगठित तरीके से फैलाने वालों तक पहुंचने के लिए अपनी जांच तेज कर दी है।
यह मामला सुरक्षा और प्रकाशन की नीतियों के बीच के संवेदनशील अंतर को उजागर करता है। अगर किताब के लीक होने की जांच में कोई दोषी पाया जाता है, तो यह पूरे प्रकाशन उद्योग के लिए एक बड़ा उदाहरण बनेगा कि कैसे बिना अनुमति के कोई किताब लीक होने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही, यह भारतीय सेना और सरकार के आंतरिक निर्णयों पर चर्चा करने वाले किसी भी दस्तावेज़ के प्रसार के मामले में नए सवाल भी खड़े करता है।



