
पिछले कुछ वर्षों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने जिस रफ़्तार से कामकाजी दुनिया में एंट्री मारी है, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. जब AI डेटा एनालिसिस, रिपोर्टिंग, फाइनेंशियल मॉडलिंग और यहाँ तक कि प्रेज़ेंटेशन तक बना सकता है, तो MBA प्रोफेशनल्स की ज़रूरत क्यों बनी हुई है? और उससे भी बड़ा सवाल- रिक्रूटर्स 36 लाख रुपये सालाना या उससे ज़्यादा का पैकेज क्यों ऑफर कर रहे हैं?
असल में, AI और MBA स्किल्स के बीच तुलना ही अधूरी है। AI एक बेहद ताक़तवर टूल है, लेकिन वह निर्णय नहीं लेता, ज़िम्मेदारी नहीं उठाता और इंसानी जटिलताओं को पूरी तरह नहीं समझता।
कॉरपोरेट दुनिया में बड़े फ़ैसले सिर्फ़ डेटा के आधार पर नहीं होते। किसी मर्जर को हरी झंडी देनी हो, किसी मार्केट से बाहर निकलना हो, या हज़ारों कर्मचारियों को प्रभावित करने वाली रणनीति बनानी हो-यहाँ बिज़नेस जजमेंट, नैतिक समझ और नेतृत्व की ज़रूरत होती है। यही वो जगह है जहाँ MBA प्रोफेशनल्स की वैल्यू पैदा होती है।
AI बता सकता है कि ‘क्या हो सकता है’, लेकिन MBA लीडर तय करता है कि ‘क्या होना चाहिए’।
36+ LPA के पैकेज दरअसल डिग्री के लिए नहीं, बल्कि रिस्क लेने की क्षमता, जटिल समस्याओं को सुलझाने और AI को सही दिशा में इस्तेमाल करने की स्किल के लिए दिए जा रहे हैं। कंपनियाँ ऐसे प्रोफेशनल्स चाहती हैं जो AI को चलाएँ, न कि उसके आदेशों पर आँख बंद करके चलें।
आज का MBA सिर्फ़ मैनेजमेंट नहीं पढ़ रहा- वह टेक्नोलॉजी, साइकोलॉजी, बिज़नेस एथिक्स और ग्लोबल इकॉनमी को एक साथ समझ रहा है। यही वजह है कि AI के दौर में भी टॉप MBA टैलेंट की कीमत घटने के बजाय बढ़ रही है।




