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अनपब्लिश्ड किताब, अनकहे सच और सरकार की बेचैनी

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Bureau Report

अनपब्लिश्ड किताब, अनकहे सच और सरकार की बेचैनी

लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण को लेकर सरकार की प्रतिक्रिया जितनी तीखी थी, उतनी ही विरोधाभासी भी। एक तरफ कहा गया कि जिस किताब का हवाला दिया जा रहा है वह प्रकाशित नहीं हुई है, इसलिए उस पर चर्चा नहीं हो सकती। दूसरी तरफ यह स्वीकार किया गया कि किताब सरकार की मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय में पड़ी हुई है। यही विरोधाभास इस पूरे विवाद का केंद्र है।

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पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ कोई काल्पनिक रचना नहीं है। यह एक ऐसे व्यक्ति के अनुभवों का दस्तावेज है जिसने देश की सेना का नेतृत्व किया, चीन के साथ वास्तविक सैन्य तनाव का सामना किया और राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों का प्रत्यक्ष गवाह रहा।

यदि इस किताब में वर्णित घटनाएं गलत हैं, तो सरकार के पास सबसे आसान रास्ता है- तथ्यों के साथ खंडन करना। लेकिन अगर किताब को प्रकाशित होने से ही रोका जा रहा है, और फिर संसद में उसका हवाला देने पर हंगामा किया जा रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर छिपाया क्या जा रहा है?

सरकार का यह कहना कि ‘मैगजीन तो कुछ भी लिख सकती है’ भी एक कमजोर तर्क है। देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाएं किसी पूर्व सेना प्रमुख के हवाले से बिना पुष्टि के ऐसे दावे नहीं छापतीं। और यदि छापती हैं, तो सरकार के पास प्रेस काउंसिल, कानूनी नोटिस और सार्वजनिक खंडन जैसे तमाम विकल्प मौजूद हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि राहुल गांधी ने यह नहीं कहा कि वे किसी गोपनीय सैन्य दस्तावेज का खुलासा कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे एक प्रकाशित लेख को कोट कर रहे हैं, जो एक पूर्व सेना प्रमुख की किताब पर आधारित है।

असल चिंता शायद यह नहीं है कि किताब प्रकाशित नहीं हुई, बल्कि यह है कि यदि वह प्रकाशित हो गई, तो कई असहज सवाल सार्वजनिक हो जाएंगे- निर्णय में देरी, राजनीतिक हिचकिचाहट और जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति पर।

राष्ट्र सुरक्षा का मतलब केवल सीमा पर सैनिक तैनात करना नहीं होता, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होता है कि निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह हो। जब सरकार किताबें रोकती है, सवालों को दबाती है और संसद में बहस से बचती है, तो वह खुद ही संदेह को जन्म देती है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि विपक्ष ने इस मुद्दे को सनसनी के तौर पर नहीं, बल्कि संसदीय चर्चा के तौर पर उठाया। अखिलेश यादव का यह कहना कि ‘अगर यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, तो राहुल गांधी को बोलने देना चाहिए’- लोकतांत्रिक सोच का परिचायक था। लेकिन सरकार ने इस अवसर को चर्चा में बदलने के बजाय टकराव में बदल दिया।

सबसे बड़ा सवाल अब यह है: क्या भारत में पूर्व सेना प्रमुख भी अपने अनुभव खुलकर लिखने के लिए सरकारी मंजूरी के मोहताज हैं? और यदि हां, तो क्या यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ स्थिति है?

किताब चाहे प्रकाशित हो या न हो, सवाल पूछे जा चुके हैं। और इतिहास बताता है कि सवालों को रोका जा सकता है, लेकिन हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।

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