
उत्तर प्रदेश के बरेली में इस्तीफा दे चुके एक मजिस्ट्रेट के साथ प्रशासनिक सख्ती का मामला सामने आया है. शंकराचार्य के समर्थन में खड़े होने के बाद सस्पेंड किए गए अधिकारी से न सिर्फ सरकारी गाड़ी वापस ले ली गई, बल्कि उन्हें जिलाधिकारी से मिलने से भी रोक दिया गया. इस घटनाक्रम ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है और इसे अफसरशाही के भीतर असहमति को दबाने की कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है.
सूत्रों के मुताबिक, संबंधित मजिस्ट्रेट ने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दिया था. इससे पहले उन्हें शंकराचार्य के समर्थन में सार्वजनिक रूप से सामने आने के कारण निलंबित कर दिया गया था. अधिकारी का आरोप है कि निलंबन के बाद उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया. इस्तीफे के बावजूद उनसे तत्काल सरकारी वाहन छीन लिया गया, जबकि सामान्य प्रक्रिया में ऐसे मामलों में कुछ औपचारिक समय दिया जाता है.
मामला तब और गरमा गया जब इस्तीफा देने के बाद मजिस्ट्रेट जिलाधिकारी से मिलने कलेक्ट्रेट पहुंचे. आरोप है कि उन्हें कार्यालय में प्रवेश तक की अनुमति नहीं दी गई. अधिकारी ने इसे न सिर्फ प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ बताया, बल्कि इसे मानसिक उत्पीड़न करार दिया. उनका कहना है कि वह अपनी बात रखने और औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने के लिए डीएम से मिलना चाहते थे, लेकिन जानबूझकर रोका गया.
वहीं जिला प्रशासन का पक्ष इससे अलग है. प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि निलंबन और इस्तीफे के बाद सरकारी सुविधाएं वापस लेना नियमों के तहत किया गया कदम है. डीएम से मुलाकात न होने को लेकर कहा गया कि इसके लिए पूर्व अनुमति और तय प्रक्रिया का पालन जरूरी होता है. प्रशासन का दावा है कि पूरे मामले में किसी तरह की दुर्भावना नहीं बरती गई.
हालांकि, इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक अधिकारियों को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है. विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों ने इस कार्रवाई को बदले की भावना से प्रेरित बताया है और निष्पक्ष जांच की मांग की है. उनका कहना है कि एक अधिकारी को उसके वैचारिक रुख के कारण इस तरह निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.






